सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उंगली उठाने वाली मायावती की खुली पोल, सबसे पहले मायावती ने किया था एससी-एसटी एक्ट को कमज़ोर, बीजेपी हुई हमलावर...... Featured

04 Apr 2018
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आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश के बाद पूरे देश में कोहराम मचा हुआ है, जिस एससी-एसटी एक्ट को लेकर बीएसपी और तमाम दलित पार्टियां शहर-शहर रणक्षेत्र बना चुकी हैं, जिस एससी-एसटी एक्ट को लेकर कई लोगों की जान चली गई उसी  एससी-एसटी एक्ट को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. उत्तर प्रदेश में मायावती के राज़ के दौरान न सिर्फ एससी-एसटी एक्ट को संशोधित किया गया था, बल्कि इस कानून को काफी हल्का भी किया गया था. इतना ही नहीं मज़ेदार बात तो यह है कि यही संशोधित कानून उत्तर प्रदेश में आज भी लागू है. आज भी यूपी में एससी-एसटी एक्ट को अलग तरीके से लागू किया जाता है, जिसके तहत अब सीधे गिरफ्तारी नहीं होती है. इस खबर के सामने आने के बाद जहाँ बीजेपी मायावती पर हमलावर हो गई है वहीँ मायावती पर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं. विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि मायावती अपनी राजनीति को बचाने के चक्कर में ये सब कर रही हैं.

गौरतलब है कि २ अप्रैल को उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में इस कानून को लेकर सड़कों पर उतरे दलित संगठनों ने जो हिंसा फैलाई थी, उसे पूरे देश ने देखा, लेकिन इस हिंसा के दो दिन बाद ही 2007 में मायावती सरकार का वह सरकारी आदेश एक बार फिर सामने आ गया, जिसमें एससी-एसटी एक्ट को न सिर्फ संशोधित किया गया, बल्कि उसमें एक धारा 182 लगाकर यह आदेश पारित किया गया कि अगर कोई इसका दुरुपयोग करेगा, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होगी. इतना ही नहीं, एससी-एसटी एक्ट में गिरफ्तारी तभी होगी, जब सीओ स्तर का कोई अधिकारी अपनी विवेचना में मामले को सही पाएगा. बीएसपी सुप्रीमो मायावती के शासन में 20 मई 2007 को तत्कालीन मुख्य सचिव प्रशांत कुमार ने एक सरकारी आदेश निकालकर एससी-एसटी एक्ट में कुछ बड़े बदलाव किए थे, जिसके तहत हत्या और बलात्कार जैसे मामलों में इस एक्ट को लगाने से पहले एसपी या एसएसपी को अपनी विवेचना करनी होती है.

सरकारी आदेश में साफ-साफ लिखा था कि किसी भी निर्दोष को इस एक्ट के तहत न तो परेशान किया जाना चाहिए और न ही फंसाया जाना चाहिए और अगर कोई ऐसा करता है, तो उसके खिलाफ धारा 182 के तहत कार्रवाई होगी. मालूम हो कि मायावती के शासन में निकाला गया यह सरकारी आदेश आज भी उत्तर प्रदेश में अमल में है. मायावती का यह आदेश अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम में संशोधन के तौर पर माना जाता है, जिसके तहत निर्दोष लोगों को फंसाने की गुंजाइश कम हो जाती है. 

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश में सड़कों पर हुई हिंसा में गिरफ्तार लोगों में कई नेता बहुजन समाज पार्टी के हैं. मायावती खुद भी अब खुलकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में हैं, लेकिन उनके शासन के दौरान का उनका ही आदेश अलग कहानी कहता है. मायावती के इस आदेश की कॉपी के सामने आने के बाद से बीजेपी बीएसपी सुप्रीमो मायावती पर हमलावर हो गई है और खुलकर मायावती पर यह आरोप लगा रही है कि दलितों और आदिवासियों के लिए बनाए गए इस एक्ट को सबसे पहले और सबसे ज्यादा कमजोर खुद मायावती ने किया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि हर बात का बिंदुवार जवाब देने वाली मायावती अपने ही इस सरकारी आदेश के सामने आने के बाद क्या तर्क सामने रखती है?

बहरहाल इतना तो तय है कि मायावती ने ही इससे पहले एससी-एसटी एक्ट को सबसे पहले संशोधित किया था ये बिलकुल साफ़ हो गया है. अब बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि जो मायावती सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठा रही थी, देश भर के दलितों को इसका विरोध करने के लिए कह रही थी उसी मायावती ने अपने राज़ में इस एक्ट को कमज़ोर किया. अब सोचना हम सबको है कि हमें ऐसे राजनीतिज्ञों के साथ चलना है जो अपनी राजनितिक रोटियां सेंकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं या फिर इस देश में अमन कायम रखते हुए आपसी भाईचारे के साथ जीना है. सोचियेगा जरुर....... (सौजन्य: आजतकडॉट इन)

 

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