उत्तर प्रदेश: खूब जम रही है बुआ-बबुआ की जोड़ी, तीसरे मोर्चे की तरफ से मायावती हो सकती हैं प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार तो वहीँ अखिलेश सम्भालेंगे उत्तर प्रदेश....! Featured

24 Jun 2018
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आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): उत्तर प्रदेश में जब से माया-अखिलेश एक साथ राजनीतिक मंच पर आये हैं उन्होंने बीजेपी के नाकों चने चबा दिए हैं. पहले गोरखपुर और फूलपुर हारा या यों कहें कि मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री दोनों को हराया. बीजेपी ने इसके लिए तैयारी न होने का बहाना बनाया. फिर कैराना और नूरपुर की बारी आई. बीजेपी ने इसके लिए अपने मंत्रियों की फौज भी दौड़ाई लाख जतन किये लेकिन फिर से माया अखिलेश ने इस बार अजीत सिंह के साथ मिलकर बीजेपी के मंसूबों पर पानी फेर दिया. अब बहाना भी क्या बनाया जाए, कैसे बीजेपी अपनी इस नाकामी को छुपाये ये भी समझ नहीं आ रहा. तो आखिर में राजनाथ सिंह को आगे आना पड़ा और ये कहना पड़ा की बड़ी लड़ाई जीतने के लिए छोटी लड़ाइयां हारनी पड़ती हैं. लेकिन सच्चाई तो ये है कि ये तर्क किसी के गले नहीं उतरा और सब को ये मालूम है कि बीजेपी की राह में 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा रोड़ा यही गठबंधन रहने वाला है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि जिसने उत्तर प्रदेश जीत लिया उसकी सरकार बनना तय है. ऐसे में बीजेपी जो पिछले चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ मतों से यूपी से जीत के आई है 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए सोच रही है कि ऐसा क्या किया जाए कि माया-अखिलेश की इस जोड़ी को मात दे सकें. लेकिन माया-अखिलेश की ये जोड़ी रुकने का नाम ही नहीं ले रही. ये गठबंधन अब और मजबूत होता जा रहा है.

इसी के मद्देनजर अब दोनों पार्टियों ने ने और निर्णय लिया है जिसके तहत दोनों ही पार्टियां एक दूसरे के बागियों को अपनी पार्टी में जगह नहीं देंगी. जिससे दोनों ही पार्टियों के बीच बगावत को लगभग न के बराबर किया जा सके. हालांकि इसके लिए दोनों ही पार्टियों ने कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया है पर सूत्रों की मानें तो बुआ-बबुआ की इस जोड़ी के बीच अब इस बात पर सहमति बन चुकी है कि अगर उनका कोई नेता चुनावों के वक़्त टिकेट न मिलने से बगावत करता है तो दोनों पार्टियाँ उसके अपने दल में जगह नहीं देंगी. इससे न केवल दोनों पार्टियों में मजबूती आएगी बल्कि बगावत को भी न के बराबर किया जा सकेगा. ताकि बीजेपी को मात देने में कोई कसर बाकी न रह जाए.

सूत्रों की मानें तो अखिलेश माया के बीच इस बात को लेकर भी सहमति बनी है कि लोकसभा चुनावों के बाद मायावती को केंद्र में रहकर प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किया जाए जबकि अखिलेश उत्तर प्रदेश पर ही अपना धयान केन्द्रित करेंगे और आने वाले वक़्त में वो उत्तर प्रदेश में गठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे. इसका इशारा अभी हाल ही में ज़ी मीडिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में अखिलेश ने दिया भी था जहाँ अखिलेश में कहा था की आने वाले लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं होंगे. पर प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही होगा. वहीँ अपने दिल्ली आने के सवाल पर उन्होंने साफ़ तौर पर इससे इंकार किया था. उन्होंने कहा था कि वो दिल्ली आना ही नहीं चाहते हैं और उनका ध्यान केवल उत्तर प्रदेश पर ही केन्द्रित है.

सूत्रों की मानें तो अखिलेश ने माया को एक फार्मूला सुझाया है जिसके मुताबिक तीसरे मोर्चे का गठन किया जाए जिसमें सभी क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर एक ऐसा गठबंधन तैयार किया जाए जो लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मात दे सके. अगर सब साथ मिलकर लडें तो मोदी को मात दी जा सकती है. और रहा सवाल जीत के बाद प्रधानमंत्री का तो इसके लिए मायावती की उम्मीदवारी पर सबकी सहमति बन सकती है. क्योंकि मायावती के नाम को लेकर न तो ममता को दिक्कत होगी और न ही किसी और क्षेत्रीय दल के नेता को. सूत्रों की मानें तो इसी रणनीति के तहत मायावती ने हरियाणा में कांग्रेस के बजाए इनेलो से गठबंधन किया है मध्य प्रदेश में भी पार्टी ऐसे विकल्पों पर विचार कर रही है जिसमें क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ किया जा सके. अगर ऐसे करने में वह मध्य प्रदेश में सफल नहीं होती हैं तो फिर बीएसपी अकेले ही चुनाव लड़ेगी नाकि कांग्रेस से गठबंधन. अभी बीएसपी बिहार में भी आरजेडी के साथ गठबंधन करना चाह रही है लेकिन वहां कांग्रेस भी शामिल है तो यहाँ शायद मायावती की बात अभी न बन पाए लेकिन इतना मायावती को पता है कि अगर तीसरा मोर्चा लोकसभा चुनाव में अच्छी सीटें जीतकर आया तो लालू को मायावती का साथ देने में कोई दिक्कत नहीं होगी. मतलब साफ़ है कि कांग्रेस और बीजेपी से बराबर की दूरी बनाई जाए और क्षेत्रीय दलों का साथ पकड़ा जाए, और अगर लोकसभा चुनावों के बाद किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं आया तो ऐसे में कांग्रेस की भी मजबूरी बन जायेगी कि वो तीसरे मोर्चे की सरकार को समर्थन दे. क्योंकि 2019 में कांग्रेस का सत्ता में आने के चांसेस लगभग न के बराबर ही हैं. ऐसे में तीसरा मोर्चा मोदी के विरुद्ध एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है.

मतलब साफ़ है कि अखिलेश और माया के बीच इस बात को लेकर सहमति बन चुकी है कि मायावती तीसरे मोर्चे की तरफ से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार होंगी और अखिलेश उत्तर प्रदेश में ही रहकर आने वाले वक़्त में गठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे. इस बात को बीजेपी भी समझ चुकी है और वो इस गठबंधन की काट ढूँढ रही है. लेकिन इतना तय है कि इस गठबंधन ने जहां पिछले 4 सालों से मरे पड़े विपक्ष को संजीवनी प्रदान की है और बीजेपी को लगातार उप-चुनावों में हराकर विपक्ष के अंदर एक आस भी पैदा की है कि मोदी को किस तरह हराया जा सकता है. अब विपक्ष यही फार्मूला पूरे देश में अपनाने की तैयारी कर रहा है. अब उसमे वो कितना कामयाब हो पाता है ये तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा लेकिन इतना तय है कि इस गठबंधन ने देश की राजनीति के स्वरूप को ही बदल दिया है जो निश्चित तौर पर बीजेपी के लिए चिंता का विषय है.

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