आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): दलित कानून (एससी-एसटी एक्ट) के विरोध में बिहार के कई जिलों में सवर्णों के विरोध प्रदर्शन की खबरें हैं. गया, बेगूसराय, नालंदा और बाढ़ जिलों में लोग सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.गया में सड़कों पर जाम हटाने गई पुलिस पर उग्र लोगों ने हमला कर दिया. कहीं-कही से पथराव की भी खबर है. सवर्ण सड़क पर उतर कर दलित क़ानून के विरोध में सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं. गया में इस कानून के विरोध में सवर्णों ने मानपुर में बाजार-हाट बंद करा दिए. यहां सड़क जाम कर रहे लोगों के खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई की और कहीं-कहीं लाठीचार्ज की भी सूचना है.

इसके अलावा बेगूसराय में लोगों ने नगर थाना के काली स्थान चौक, हेमरा चौक और मुफसिल थाना क्षेत्र के मोहनपुर-राजौरा सड़क को जाम कर दिया. गुस्साए लोग टायर जलाकर प्रदर्शन कर रहे हैं. लखीसराय में भी आरक्षण और दलित कानून के विरोध में लोगों में नाराजगी है. बेगूसराय में भूमिहार ब्राह्मण एकता मंच की ओर से बिहार बंद बुलाया गया, जिसका असर देखा जा रहा है.  शहर के काली स्थान चौक, BP स्कूल चौक सहित कई जगहों पर सड़क जाम कर आवागमन ठप कर दिया गया है. विरोध कर रहे लोगों ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग उठाई है. यहां के एनएच 28 और 31 पर कई जगह जाम है.

उधर नालंदा में दलित कानून के विरोध में सवर्णों ने प्रदर्शन किया. मालनदा के एनएच 31 सहित काई जगहों पर बंद के कारण जाम दिख रहा है. लोगों का विरोध प्रदर्शन जारी है.बाढ़ में सवर्णों ने सबीआर चौक पर एनएच 31 जाम कर दिया. लोग आगजनी कर विरोध प्रदर्शन तेज कर रहे हैं. यहां सड़कों पर दो घंटे से ट्रैफिक ठप है. आरक्षण के विरोध में शेखपुरा के बरबीघा में भी लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया है. जाम के कारण यहां ट्रैफिक प्रभावित है. कई स्कूल बस जाम में फंसी हैं.( सौजन्य: आजतक डॉट इन)

आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): चारा घोटाले से जुड़े मामले में सजा काट रहे राजद प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने गुरुवार को रांची की सीबीआई कोर्ट में किया. सरेंडर करने से पहले लालू यादव ने कहा कि उन्हें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है, जो भी कोर्ट का आदेश होगा वह उसका पालन करेंगे. उन्होंने कहा कि हमारी कोई इच्छा नहीं है. बता दें कि लालू 10 मई को अपने बेटे तेजप्रताप यादव की शादी के लिए बाहर आए थे, जिसके बाद अब करीब 110 दिन बाद वह जेल लौटेंगे. लालू यादव यहां से सीधे जेल में जाएंगे, इसके बाद उन्हें रिम्ज़ अस्पताल में शिफ्ट किया जा सकता है. लालू यादव, पिछले कई दिनों से जमानत पर थे, वह मुंबई में अपना इलाज करा रहे थे. लालू के सरेंडर करने से पहले गुरुवार को झारखंड विकास मोर्चा (JVM) चीफ बाबूलाल मरांडी ने रांची में उनसे मुलाकात की.

लालू से मुलाकात करने के बाद बाबूलाल मरांडी ने कहा कि राजनीति के कारण बीजेपी लालू यादव पर शिकंजा कस रही है. इस सरकार का बस चले तो दलितों की आवाज उठाने वालों पर गोली चलवा दे. बीते 27 अगस्त को लालू की जमानत की मियाद पूरी हो रही थी. इससे पहले लालू ने अदालत से औपबंधिक जमानत की अवधि तीन महीने और बढ़ाने की अपील की थी जिसे अदालत ने अस्वीकार करते हुए उन्हें 30 अगस्त तक सीबीआई अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया था.

सरेंडर करने से पहले मोदी सरकार को घेरा 

पटना से रवाना होने से पहले आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि देश तानाशाह शासन की ओर बढ़ रहा है. पटना एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बातचीत में लालू ने बिहार में कानून व्यवस्था ठीक नहीं होने का आरोप लगाते हुए कहा कि यहां पूरी तरह से अराजकता का माहौल है. उन्होंने कहा कि जब रोम जल रहा था, नीरो बंसी बजा रहा था, वही हालत नीतीश की है. लालू ने आरोप लगाया कि कोई ऐसा दिन नहीं है कि खून, हत्या और बलात्कार की वारदात नहीं घट रही है.

लालू एम्स से जब मई महीने में डिस्चार्ज होकर रिम्स में इलाज के लिए गए तो उस समय वह करीब 15 बीमारियों से जूझ रहे थे. इन बीमारियों में टाइप टू डायबिटीज, हाइपरटेंशन, पेरिएनल एब्सेस, किडनी इंज्यूरी एंड क्रोनिक किडनी डिजीज, बाएं आंख में मोतियाबिंद, वॉल्व रिप्लेसमेंट और फैटी लीवर शामिल हैं.(सौजन्य: आजतक डॉट इन)

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली):  बड़ी खबर ये है कि श्रीनगर में एक होटल के बाहर लड़की के साथ हिरासत में लिए गए मेजर लितुल गोगोई के खिलाफ अब अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी. कोर्ट ने उन्हें ड्यूटी के वक्त ऑपरेशनल एरिया से दूर होने का दोषी पाया है. साथ ही मेजर गोगोई को निर्देशों के खिलाफ जाकर स्थानीय नागरिक से मेल-मिलाप बढ़ाने का भी दोषी पाया गया है. गौरतलब है कि इसी साल 23 मई को भारतीय सेना के मेजर लितुल गोगोई श्रीनगर के होटल ग्रैंड ममता में बडगाम की लड़की के साथ हिरासत में लिए गए थे. मामला सामने आने के बाद सेना ने इस मामले में कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी का आदेश दिया था.

मेजर गोगोई कथित तौर पर स्थानीय लड़की के साथ होटल में चेक-इन करना चाहते थे. इसी बात को लेकर विवाद हुआ और होटल प्रबंधन ने पुलिस बुला ली थी. पुलिस ने मेजर गोगोई और लड़की को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया था. आईजीपी ने इस मामले की जांच श्रीनगर जोन के एसपी सज्जाद शाह को सौंपी थी, जबकि गोगोई को सेना की बडगाम यूनिट के पास वापस भेज दिया गया था.

गौरतलब है कि मेजर गोगोई उस समय चर्चा में आये थे जब उन्होंने पत्थर बाजों से निपटने के लिए उनके ही एक साथ को जीप के आगे बाँध दिया था.... जिसके बाद पूरे देश में उनकी इस बहादुरी की चर्चा हुई थी.....(सौजन्य: आजतक डॉट इन)

 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया है. एम्स (AIIMS) ने मेडिकल बुलेटिन जारी कर यह जानकारी दी है. अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) के विचार देश भर के लोगों को प्रेरणा देते हैं. उनके विचार आपके जीवन को बदल सकते हैं. हम आपको अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेरणादायक विचारों के बारे में बता रहे हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी के विचार :-

1. छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता.

2. जीत और हार जीवन का एक हिस्सा है, जिसे समानता के साथ देखा जाना चाहिए.

3. अगर भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं है, तो भारत बिल्कुल भारत नहीं है.

4. होने, ना होने का क्रम, इसी तरह चलता रहेगा. हम हैं, हम रहेंगे, ये भ्रम भी सदा पलता रहेगा.

5.  मैं हमेशा से ही वादे लेकर नहीं आया, इरादे लेकर आया हूं.

6. लोकतंत्र एक ऐसी जगह है जहां दो मूर्ख मिलकर एक ताकतवक इंसान को हरा देते हैं.

7. मेरे पास ना दादा की दौलत है और ना बाप की. मेरे पास मेरी मां का आशीर्वाद है.

8. आप मित्र बदल सकते हैं पर पड़ोसी नहीं.
9. क्यों मैं क्षण-क्षण में जियुं? कण-कण में बिखरे सौंदर्य को पियूं?

10. ​गरीबी बहुआयामी है यह हमारी कमाई के अलावा, स्वास्थ्य राजनीतिक भागीदारी, और हमारी संस्कृति और सामाजिक संगठन की उन्नति पर भी असर डालती है.(सौंजन्य:खबर डॉट एनडीटीवी)

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): आख़िरकार वो दुखद खबर आई जिससे पूरे देश में गम का माहौल छा गया.... आज हमारे बीच देश के बड़े नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपाई नहीं रहे...... AIIMS की और से जारी किये गये बुलेटिन के मुताबिक उन्होंने 5:05 बजे उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली........ बाजपाई के निधन से राजनीति के एक युग का अंत हुआ है... आज राजनीति के क्षेत्र का एक चमकता सितारा कहीं खो गया जिसकी क्षति की भरपाई शायद कभी भी न हो पाए.... आवाज़ न्यूज़ नेटवर्क परिवार की और से अटल जी को भावपूर्ण श्रद्धांजली....... अटल जी आप हमारे दिलों में हमेशाअमर रहेंगे.........

आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): मध्य प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी थमने का नाम ही नहीं ले रही. अब पार्टी एक-दो नहीं बल्कि कई खेमों में बंटी नजर आ रही है. साल के अंत में मध्य प्रदेश में चुनाव होने हैं ऐसे में ऐसी ख़बरें कांग्रेस की नींद उड़ाने वाली हैं. गुटबाजी का ये नज़ारा तब देखने को मिला जब रीवा में कांग्रेस महासचिव और चुनाव प्रभारी दीपक बाबरिया ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि अगर मध्य प्रदेश में अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो कमलनाथ या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया में से कोई एक मुख्यमंत्री होगा. बाबरिया के ऐसा कहने से दूसरे दिग्गज़ नेताओं के कार्यकर्ता भड़क गये और उन्होंने बाबरिया की पिटाई कर डाली. मौके की नज़ाकत को समझते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आपात बैठक बुलाई है.

गौरतलब है कि बाबरिया रीवा के सर्किट हाउस में पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे. जहाँ उनसे जब कांग्रेस के सम्भावित मुख्यमंत्री के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो कमल नाथ या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया में से कोई एक मुख्यमंत्री बनेगा. इसके बाद एक और पत्रकार ने बाबरिया से पूछा कि क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस के दिग्गज नेता और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह मुख्यमंत्री की रेस से बाहर हो गये हैं तो इसपर बाबरिया ने कहा कि वो जो आप समझो. ऐसा जवाब सुनते ही वहां मौजूद अजय सिंह के समर्थक भड़क गये. उन्होंने बाबरिया के साथ धक्का-मुक्की की. बाबरिया बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर सर्किट हाउस के अपने कमरे में चले गये.

हालांकि अजय सिंह ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि न तो वो अराजक हैं और ना ही उनके समर्थक ऐसी घटिया हरक़त कर सकते हैं. उन्होंने घटना पर दुःख जताते हुए कहा कि "जो भी हुआ, गलत हुआ है. ऐसे लोगों पर सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. वहीँ बाबरिया के साथ हुई इस धक्का-मुक्की की ख़बरें मीडिया में आने के बाद मध्य प्रदेश के गृहमंत्री भूपिंदर सिंह ने घटना का संज्ञान लेते हुए बाबरिया को पात्र लिखते हुए उनसे अनुरोध किया है कि यदि बाबरिया चाहें तो अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से अनुरोध कर सकते हैं. सरकार उन्हें पूरी सुरक्षा देगी.

गृहमंत्री ने बारिया को लिखे अपने पत्र में कहा है कि मुझे मीडिया रिपोर्ट्स से ज्ञात हुआ है कि रीवा में आपसे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने धक्का मुक्की की. इससे पहले भी आपके साथ इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. मैं आपके साथ होने वाली इन घटनाओं से बहुत चिंतित हूँ. गृहमंत्री ने अपने पत्र में कहा कि यदि कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से बचाने के लिए आपको सुरक्षा की जरुरत हो तो आप मुझे बताएं, ताकि सुरक्षा के प्रबंध किये जा सकें. गृहमंत्री ने आगे कहा कि मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि मध्य प्रदेश सरकार आपको पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करेगी. 

वहीं कांग्रेस ने इस घटना को बीजेपी प्रायोजित बताया. कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा ने कहा कि ये सब बीजेपी प्रायोजित घटना थी. उन्होंने गृहमंत्री के सुरक्षा मुहैया कराने वाले ब्यान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि गृह मंत्री की जिम्मेवारी सबसे पहले प्रदेश की बेटियों को सुरक्षा देने की है जिनके साथ रोज़ बलात्कार हो रहे हैं. बेटियों को तो सुरक्षा दे नहीं पा रहे हैं और बाबरिया को देने की बात कह रहे हैं.......

 

 

आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): आज कारगिल विजय दिवस है वो दिन जब हमारे देश के वीर जवानों ने पाकिस्तानी सेना के दुस्साहस का करार जवाब देते हुए न केवल उसे युद्ध के मैदान में धूल चटाई थी बल्कि दुश्मन पीठ दिखाकर भाग खडा हुआ था. भारतीय सेना के व्स्स्र जांबाजों ने इसी दिन फिर से कारगिल को फट करते हुए वहां तिरंगा लहराया था. इस मौके पर देश के प्रधानमंत्री ने भी भारतीय सेना के वीर सैनिकों के शौर्य की सराहना की है साथ ही कारगिल में बलिदान देने वाले भारतीय वीर जवानों को भी श्रद्धांजली दी है. आवाज़ न्यूज़ नेटवर्क परिवार की तरफ से भी हमारे वीर जवानों को हृदय से नमन जिनके कारण हम अमनों-चैन से जीते हैं.

गौरतलब कारगिल का युद्ध दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहला युद्ध था, जिसमें हर मिनट दुश्मनों पर फायरिंग की गई. हालांकि कारगिल की लड़ाई अपने आप में कई राज छुपाए हुए है. उस समय क्या हुआ था ये कोई नहीं जानता. हर कोई अलग-अलग अंदाजा लगाता है. इसीलिए हम आज आपको बताने जा रहे हैं कारगिल से जुड़े कुछ अहम राज जिन्हें जानकर आप हैरान हो जाएंगे. कारगिल की लड़ाई में हमारे सैनिकों ने पाकिस्तानी फौज का जमकर मुकाबला किया था. पाकिस्तानी घुस्पैठियों ने लगातार गोलियां चलाई और हमारे सैनिकों ने उन्हें सामने से जवाब दिया. आइये आपको बताते हैं इस युद्ध से जुड़े कुछ तथ्य:.......

दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में कारगिल युद्ध हुआ था. इसकी शुरुआत हुई थी 8 मई 1999 से जब पाकिस्तानी फौजियों और कश्मीरी आतंकियों को कारगिल की चोटी पर देखा गया था. माना जाता है कि पाकिस्तान इस ऑपरेशन की 1998 से तैयारी कर रहा था. एक बड़े खुलासे के तहत पाकिस्तान का दावा झूठा साबित हुआ कि करगिल लड़ाई में मुजाहिद्दीन शामिल थे. यह लड़ाई पाकिस्तान के नियमित सैनिकों ने लड़ी. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व अधिकारी शाहिद अजीज ने यह राज उजागर किया था.

कारगिल सेक्टर में 1999 में भारतीय और पाकिस्तानी सैनिकों के बीच लड़ाई शुरू होने से कुछ सप्ताह पहले जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक हेलिकॉप्टर से नियंत्रण रेखा पार की थी और भारतीय भूभाग में करीब 11 किमी अंदर एक स्थान पर रात भी बिताई थी. मुशर्रफ के साथ 80 ब्रिगेड के तत्कालीन कमांडर ब्रिगेडियर मसूद असलम भी थे. दोनों ने जिकरिया मुस्तकार नामक स्थान पर रात बिताई थी.

जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था. कई लोगों का कहना है कि कारगिल की लड़ाई उम्मीद से ज्यादा खतरनाक थी. हालात को देखते हुए मुशर्रफ ने परमाणु हथियार तक इस्तेमाल करने की तैयारी कर ली थी. पाकिस्तानी सेना कारगिल युद्ध को 1998 से अंजाम देने की फिराक में थी. इस काम के लिए पाक सेना ने अपने 5000 जवानों को कारगिल पर चढ़ाई करने के लिए भेजा था.

कारगिल की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को पहले इस ऑपरेशन की खबर नहीं दी गई थी. जब इस बारे में पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को बताया गया तो उनहोंने इस मिशन में आर्मी का साथ देने से मना कर दिया था. पाकिस्तानी सेना कारगिल युद्ध को 1998 से अंजाम देने की फिराक में थी. इस काम के लिए पाक सेना ने अपने 5000 जवानों को कारगिल पर चढ़ाई करने के लिए भेजा था.

कारगिल की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को पहले इस ऑपरेशन की खबर नहीं दी गई थी. जब इस बारे में पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को बताया गया तो उनहोंने इस मिशन में आर्मी का साथ देने से मना कर दिया था. उर्दू डेली में छपे एक बयान में नवाज शरीफ ने इस बात को स्वीकारा था कि कारगिल का युद्ध पाकिस्तानी सेना के लिए एक आपदा साबित हुआ था. पाकिस्तान ने इस युद्ध में 2700 से ज्यादा सैनिक खो दिए थे. पाकिस्तान को 1965 और 1971 की लड़ाई से भी ज्यादा नुकसान हुआ था.

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ कारगिल युद्ध में मिग-27 और मिग-29 का प्रयोग किया था. मिग-27 की मदद से इस युद्ध में उन स्थानों पर बम गिराए जहां पाक सैनिकों ने कब्जा जमा लिया था. इसके अलावा मिग-29 करगिल में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ इस विमान से पाक के कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलें दागी गईं थीं.

मई को कारगिल युद्ध शुरू होने के बाद 11 मई से भारतीय वायुसेना की टुकड़ी ने इंडियन आर्मी की मदद करना शुरू कर दिया था. कारगिल की लड़ाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में वायुसेना के करीब 300 विमान उड़ान भरते थे.

कारगिल की ऊंचाई समुद्र तल से 16000 से 18000 फीट ऊपर है. ऐसे में उड़ान भरने के लिए विमानों को करीब 20,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ना पड़ता है. ऐसी ऊंचाई पर हवा का घनत्व 30% से कम होता है. इन हालात में पायलट का दम विमान के अंदर ही घुट सकता है और विमान दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है.

भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में लड़े गए कारगिल युद्ध में तोपखाने (आर्टिलरी) से 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे. 300 से अधिक तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों ने रोज करीब 5,000 बम फायर किए थे. लड़ाई के महत्वपूर्ण 17 दिनों में प्रतिदिन हर आर्टिलरी बैटरी से औसतन एक मिनट में एक राउंड फायर किया गया था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी, जिसमें किसी एक देश ने दुश्मन देश की सेना पर इतनी अधिक बमबारी की थी.(सौजन्य:आजतक डॉट इन)

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): महाराष्ट्र में बीजेपी और शिव-सेना दोनों पार्टियों में मतभेद दिनोंदिन गहराते जा रहे हैं. दोनों ही पार्टियाँ अगले लोकसभा चुनाव में अलग-अलग लड़ने का मन बना चुकी हैं. शिव-सेना ने तो खुले मंच से इसका ऐलान भी कर दिया है लेकिन बीजेपी अभी ऐसा करने से बाख रही है लेकिन सूत्रों की मानें तो बीजेपी ने भी इसके लिए तयारी शुरू कर दी है और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को इसके लिए तैयारी शुरू करने के लिए भी कह दिया है. मतलब साफ़ है कि तीन दशकों तक साथ चलने के बाद अब बीजेपी-शिव्सेनाल्ग होने की राह पर खड़े हैं. हालांकि बीजेपी सांसद सुब्रमणियास्वामी की मानें तो शिव-सेना लोकसभा चुनावों के आते-आते बीजेपी के साथ आ जाएगी लेकिन राजनितिक पंडितों की मानें तो अभी इसके आसार कम ही नजर आ रहे हैं. ऐसे में अगर शिव-सेना बीजेपी के रास्ते महाराष्ट्र में अलग होते हैं तो कांग्रेस और एनसीपी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहेगा क्योंकि उन्हें पता है कि बीजेपी-शिवसेना अगर मिलकर लादे तो फिर उन्हें हराना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन हो जाएगा. अब सवाल ये पड़ा होता है कि अगर बीजेपी-शिव-सेना अलग हुए तो फिर होने वाले इस नुक्सान की भरपाई कैसे होगी? तो इस सवाल का समाधान बीजेपी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने खोज लिया है. सूत्रों की मानें तो शिव-सेना के एनडीए से जाने की स्थिति में बीजेपी तमिलनाडु की एआईए डीएमके को अपने साथ एनडीए में लाकर जहां नुक्सान की भरपाई करेगी वहीँ दक्षिण में भी पार्टी के इस कदम से बीजेपी का जनाधार बढाने में मदद मिलेगी.

सूत्रों की मानें तो अमित शाह ने एआईएडीएमके से नजदीकियां बढाने की कवायद भी शुरू कर दी है. इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला जब संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान एआईएडीएमके  बीजेपी के साथ खड़ी हुई दिखाई दी. और इससे पहले भी बीजेपी ने एआईएडीएमके के दो धड़ों को एक करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके लिए स्वयं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने उनका शुक्रिया अदा किया था. राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस नए पार्टनर की पठकथा काफी पहले से लिखी जा रही है और समय आने पर इस बात का ऐलान भी हो जाएगा. वैसे भी डीएमके के कांग्रेस के साथ जाने के बाद एआईएडीएमके के पास दूसरा कोई चारा बचा भी नहीं है. जानकारों की मानें तो बीजेपी के इस कदम से जहाँ पार्टी का जनाधार दक्षिण में भी बढ़ेगा, वहीँ पार्टी शिव-सेना के अलग जाने से होने वाले मुक्सान की भरपाई करने के साथ मुनाफे में भी जायेगी. क्योंकि लोकसभा में इस समय जहाँ शिव-सेना के 18 सांसद हैं वहीं एआईएडीएमके के 37, वहीं राज्यसभा में शिव-सेना के मात्र 3 सांसद हैं वहीं एआईएडीएमके के 13. यानी मतलब साफ़ है कि एनडीए की स्थिति और मजबूत होगी.

हालांकि इसके लिए अभी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह थोडा इंतज़ार कर रहे हैं. सूरतों की मानें तो शाह साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव तक का इंतज़ार कर रहे हैं. अगर नतीज़े बीजेपी की आशा के अनुरूप आते हैं तो बीजेपी निश्चित तौर पर शिव-सेना की विदाई ही करना चाहेगी क्योंकि बीजेपी का मानना है कि एक टफ तो शिव-सेना सत्ता की मलाई खा रही है और दूसरी तरफ बीजेपी को बात-बात पर आँख दिखाती है. ऐसे में उसका एनडीए से अलग होना ही बेहतर है. सुरों की मानें तो महाराष्ट्र में ही शिव-सेना के अलग होने की स्थिति में राज ठाकरे को भी अपने साथ लिया सकता है और इसमें केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी अहम भूमिका निभा सकते हैं. अब आगे होगा क्या इसका पता तो साल के अंत में होने वाले कुछ राज्यों के चुनावों के नतीजों के बाद चल ही जाएगा, लेकिन इतना तय है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपना जमा-घटा का खेल शुरू कर दिया है और किसी भी कीमत पट अपने मिशन 2019 को पूरा करने में जुटे हुए हैं.

 

 

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली):  देश भर में लोकसभा चुनावों का आगाज़ हो चूका है. तमाम पार्टियों ने इसके लिए कमर कस ली है. फिर चाहे वो सत्तारूढ़ बीजेपी हो या कांग्रेस सबने अपने हिसाब से राजनितिक समीकरण बैठने शुरू कर दिए हैं. लेकिन इन सब के बीच एक बाद खबर ये आ रही है कि कल तक जो कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बता रहे थे उन्होंने अब परिस्थियों को भापते हुए प्रधानमंत्री पद की अपनी उम्मीदवारी से हाथ पीछे खींच लिए हैं. राजनितिक पंडितों की मानें तो ऐसा कदम कांग्रेस ने बहुत घन विचार-विमर्श के बाद उठाया है.

दरअसल पिछले काफी समय से कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ महागठबंधन के लिए प्रयासरत है लेकिन उसमे उसे अबतक कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली है. कांग्रेस ने इसके लिए कई क्षेत्रीय क्षत्रपों से भी सम्पर्क साधा लेकिन बार सिरे चढ़ते हुए नहीं दिख रही है. क्योंकि ज्यादातर क्षेत्रीय दलों को राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मंजूर नहीं हैं. इसलिए कांग्रेस अब मजबूरी में राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की  उम्मीदवारी से कदम पीछे खींच रही है. सूत्रों की मानें तो कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेत्रित्व में सब दलों को एकजुट करने का अभियान तो चलाया लेकिन जेडीएस को छोड़कर कोई भी दूसरा दल राहुल गांधी के नेत्रित्व में चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ. ऐसे में कांग्रेस ने अब राहुल की उम्मीद्वारी को पीछे छोड़ देश भर में मोदी के खिलाफ महागठबंधन बनाने की कवायद शुरू की है.

जनसत्ता की मानें तो राहुल गांधी अब सब क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लेकर चलना चाह रहे हैं और इसके लिए कई प्रदेशों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को ज्यादा सीटें देकर खुद कम सीटों पर भी लड़ सकती है. मुख्य मिशन मोदी को सत्ता में आने से रोकना है और इसके लिउए उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र राहुल की रणनीति में सबसे आगे हैं. उत्तर प्रदेश में जहां कांग्रेस सपा-बसपा आर एल डी के साथ गठबंधन में उतरने के लिए प्रयासरत है वहीँ बिहार में आर जे डी और पश्चिम बंगाल में ममता की टी एम् सी के साथ गठबंधन की कवायद में जुटी हैं. ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन के रूप में देखने को मिलेगा. दरअसल राहुल को लगता है कि अगर मोदी को सत्ता में काबिज़ होने से रोकना है तो ये राज्य सबसे महत्वपूर्ण साबित होंगे. ऐसे में कांग्रेस उतर प्रदेश में जहां बसपा और सपा को ज्यादा सीटें देकर खुद नाममात्र की सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी वहीँ पश्चिम बंगाल में ममता और बिहार में आर जे डी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेंगी जबकि कांग्रेस के हिस्से कम ही सीटें आएँगी. हालांकि महाराष्ट्र की परिस्थितियां थोड़ी अलग हैं. यहाँ कांग्रेस की एनसीपी के साथ बराबर की सीटों पर लड़ने की बात बन सकती है. या फिर यहाँ कांग्रेस लोकसभा में ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और विधानसभा चुनाव में एनसीपी को ज्यादा सीटों पर लड़ने के लिए राज़ी कर सकती है. शरद पवार को भी इसमें कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि उनका सारा ध्यान महाराष्ट्र की राजनीती पर ही है.

अब सबसे जरुरी बात जो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर है कि आखिर किसके नेत्रित्व के नीचे कांग्रेस और बाकी दूसरे दल मोदी के खिलाफ उतरेंगे. सूत्रों की मानें तो इसके लिए कांग्रेस ने एक फार्मूला तैयार किया है. जिसमे हर एक राज्य में चेहरा अलग होगा. जहां कांग्रेस की स्थिति मज़बूत है वहां राहुल गांधी ही मुख्य चेहरा होंगे वहीँ उत्तर प्रदेश में मायावती, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में तेजस्वी यादव मोदी के खिलाफ लड़ाई में मुख्य चेहरा होंगे. वहीँ अगर चुनावों में एनडीए 230 -240 सीटों में सिमट जाता है तो फिर कांग्रेस पहले राहुल गांधी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करेगी. अगर बात नहीं बनती है तो फिर कांग्रेस मायावती या फिर ममता बनर्जी के ऊपर भी अपना दांव खेल सकती है. यानी मतलब साफ़ है मोदी को रोको और उसके लिए फिर चाहे किसी भी हद तक जाना पड़े.

 

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): कहते हैं जिसने देश पर राज करना हो तो उसे उत्तर प्रदेश पर पहले कब्ज़ा ज़माना पड़ता है, या यों कहें कि केंद्र की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर ही गुजरता है. लेकिन अभी हाल ही में जिस तरह से उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने जिस तरह से गोरखपुर और फूलपुर और फिर कैराना और नूरपुर हारा उसने बीजेपी के मिशन 2019 के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है. बीजेपी बच्क्फूत पर है और उसके विरोधी ये मानकर चल रहे हैं की आगामी लोकसभा चुनावों में भी सपा-बसपा का ये गठबंधन मोदी के विजय रथ को रोकने में कामयाब रहेगा. ऐसे में अगर कांग्रेस भी सपा-बसपा के साथ जुड़ गई तो बीजेपी के राहें और मुश्किल हो जायेंगी. इन्हीं सब चुनौतियों के मद्देनजर अब उत्तर प्रदेश की कमान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्भाली है और वो अब एक ऐसी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं जिससे बीजेपी एक बार फिरसे 2019 में उत्तर प्रदेश के किले को फट करते हुए केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हो. सूत्रों की मानें तो मोदी-अमित शाह-और योगी ने मिलकर ऐसी रणनीति तैयार की है जिससे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के मंसूबों पर पानी फेरा जा सके. मोदी-शाह-योगी जिन पहलुओं पर काम कर रहे हैं आइये उनपर डालते हैं एक नजर:-

 मोदी की रैलियों से बनाया जा रहा है बीजेपी के पक्ष में माहौल.....

सूत्रों की मानें तो बीजेपी उत्तर प्रदेश में मोदीमय माहौल बनाने में एक बार फिर से जुट गई है. जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं मोर्चा संभाल लिया है. चुनाव से एक साल पहले से ही मोदी एक के बाद एक ताबड़तोड़ रैलियां करने में जुटे हैं. इसी कड़ी में पिछले एक महीने के अंदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सूबे में पांच रैलियों को सम्बोधित कर चुके हैं और आगे भी ये सिलसिला जारी रहने की उम्मीद जताई जा रही है. सूत्रों की मानें तो लोकसभा चुनवा से पहले उत्तर प्रदेश में प्रधानमन्त्री मोदी की लगभग 20 रैलियां कराने की योजना बनाई गई है. रैलियों की रूपरेखा कुछ इस तरह से तैयार की गई है जिसमे प्रत्येक रैली के जरिए 2 से 3 संसदीय क्षेत्रों वोटरों को कवर किया जा सके.जिससे फिर से एक बार चुनाव से पहले सूबे का माहौल मोदीमय हो जाए और चुनावों में इसका फायदा बीजेपी को मिल सके.

जल्द हो सकता है योगी मंत्रिमंडल में फेरबदल......

सूत्रों की मानें तो 2019 के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में जल्द मंत्रिमंडल में फेरबदल के साथ-साथ विस्तार भी हो सकता है. जिसमें उन चेहरों को तरजीह दी जा सकती जिन्होंने विभिन्न मुद्दों पर कई बार योगी के खिलाफ आवाज़ उठाई है. साथ ही मंत्रिमंडल कुछ दलित चेहरों को भी तरजीह दी जा सकती है जिससे सपा-बसपा के गठबंधन को हराया जा सके. दरअसल उत्तर प्रदेश में बीजेपी मायावती के सामने कुछ ऐसे दलित चेहरों को उतरना चाहती है जो मायावती के कद के हों. साथ ही दलित समुदाय से कुछ ऐसे युवाओं को भी आगे लाना चाह रही है जिनकी छवि दलितों के बीच अच्छी हो. ऐसे में उम्मीद ये जताई जा रही है कि ऐसे किसी दलित चेहरे को भी मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है जो बेशक पहली बार चुनाव जीता हो लेकिन उसकी पकड़ जनता के बीच अच्छी हो.

कई ताक़तवर मंत्रियों को भी लड़वाया जा सकता है चुनाव.....

सपा-बसपा गठबंधन की चुनौती और मौजूदा सांसदों के खिलाफ विरोधी फैक्टर का मुकाबला करने के लिए बीजेपी यूपी सरकार के अपने कई ताकतवर मंत्रियों को चुनाव लड़ा सकती है. इसके लिए बीजेपी राज्य के अपने सबसे प्रभावशाली मंत्रियों की सूची भी तैयार कर रही है, जिनकी चुनाव क्षेत्र में अच्छी पकड़ है. वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सतीश महाना, एसपी शाही, दारा सिंह चौहान, एसपीएस बघेल और स्पीकर हृदय नारायण दीक्षित जैसे चेहरों को 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी उतार सकती है.

नए चेहरों पर भी लगाया जायेगा दांव...... 

बीजेपी हाई कमान ने चुनावों से काफी वक़्त पहले ही ये साफ संकेत दिए हैं कि वह 71 विजयी उम्मीदवारों में से 50 फीसदी को इस बार मौका नहीं देंगे जिसका मतलब ये हुआ कि इन सीटों पर नए उम्मीदवार नजर आयेंगे. ऐसे में पार्टी को जिताऊ उम्मीदवारों की जरूरत है जिससे राज्य में सीटों का गणित न गड़बड़ाए. सूत्रों की मानें तो इन सभी सीटों पर बीजेपी ऐसे कुछ नए चेहरों को मैदान में उतारेगी जो मोदी के लिए भविष्य की राजनीती करें और जनता के बीच उनकी छवि भी अच्छी हो. बीजेपी ये प्रयोग दिल्ली के मुन्सिपिअल इलेक्शन में भी कर चुकी है जहाँ उसे इसमें कामयाबी मिली थी. बीजेपी का इस बात पर भी फोकस है कि उम्मीदवार मजबूत हों और उनकी जीत पक्की हो. हालांकि अभी गोरखपुर सीट को लेकर बीजेपी बड़ी दुविधा में है. योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने बाद हुए उपचुनाव में बीजेपी को हार मिली है. ऐसे में मजबूत उम्मीदवारों को लेकर मंथन किया जा रहा है.

OBC समुदाय के गैर यादव वोट बैंक पर रहेगी ख़ास नजर......

सपा-बसपा के साथ आने से बीजेपी का समीकरण बिगड़ा है ये बात बीजेपी को भली-भाँती तरह पता है. पार्टी को ये मालूम है कि यादव समुदाय का वोट बैंक उसे हासिल नहीं हो पायेगा. जो यादव बीजेपी के साथ जुदा है वो हर हाल में उसके साथ ही रहेगा लेकिन सपा से यादव वोट बैंक को छीनना अभी मुमकिन नहीं है. ऐसे में बीजेपी अपनी जमीन को मजबूत करने के लिए गैर यादव ओबीसी मतों को साधने की कवायद में जुट गई है. गैर यादव वोट बैंक पर नजर डालें तो यहाँ बीजेपी खासकर कुर्मी समुदाय को अपने पक्ष में साधने के लिए जुट गई है. बीजेपी ने इसको लेकर बीजेपी ने खास प्लान बनाया है. उसी प्लान के चलते मोदी की यूपी में अभी तक जो रैलियां हुई हैं उनमें मिर्जापुर और शाहजहांपुर दोनों कुर्मी बहुल क्षेत्र है. सूत्रों की माने तो बीजेपी जल्द क=ही इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में पार्टी की कमान कुर्मी समाज के नेता को सौंप सकती है. इसके अलावा प्रजापति, मौर्य, लोध, पाल सहित गैर यादव ओबीसी पर बीजेपी का ख़ास धयान है और पार्टी उ=इन समुदायों को अपने साथ जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. पार्टी यादव समुदाय को उत्तर प्रदेश में कुछ इस तरह पेश कर रही है जैसे अखिलेश के राज़ में केवल यादवों का ही भला हुआ और बाकी ओ बी सी समुदाय की अखिलेश ने अनदेखी की.

ध्रुवीकरण की बिसात फिर दिखायेगी अपनी करामात ......

सपा-बसपा जातीय समीकरण के जरिए मोदी को मात देने की कोशिश में हैं. वहीं, बीजेपी 2014 की तर्ज पर हिंदुत्व की बिसात बिछाने में जुटी है. यूपी में बीजेपी उन सीटों पर खास नजर लगाए हुए हैं, जहां विपक्ष मुस्लिम उम्मीदवार उतारेगा. खासकर पश्चिम यूपी की सीटों पर नजर है, जहां आसानी से ध्रुवीकरण के जरिए चुनावी जंग फतह की जा सके.यानी मतलब साफ़ है कि जिस तरह बीजेपी ने पिछली बार किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकेट नहीं दिया था ठीक उसी तरह इस बार भी बीजेपी किसी भी मुस्लिम को टिकेट नहीं देगी.

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