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आवाज़(ब्यूरो, दिल्ली): नरेंद्र मोदी ने जब यूपीए के खिलाफ अपना चुनाव प्रचार शुरू किया था तो यूपीए का बेरोज़गारी पर लगाम न लगा पाना  उनका मुख्य मुद्दा था और अपनी सरकार आते ही रोज़गार के अवसर बढाने का वादा. लेकिन बीते 4 साल में जिस तरह से सरकार इस मोर्चे पर फ़ैल हुई है उससे मोदी कि नींद भी उडी हुई है. अब विपक्ष के निशाने पर सीधे सीधे नरेंद्र मोदी हैं और विपक्ष बार-बार उनकी सरकार को केवल जुमलों कि सरकार करार दे रहा है. इसी के चलते अब अपने चार साल के कार्यकाल में प्रतिवर्ष एक करोड़ लोगों को नौकरी नहीं देने के वादे पर चौतरफा वार झेल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अब स्वरोजगार पाए लोगों का आंकड़ा भी रोजगार पाए लोगों की सूची में शामिल करने पर विचार कर रही है. अगर ऐसा होता है तो सीधे तौर पर ये कहा जा सकता है कि पिछले चार साल में नौकरी पाने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक इजाफा होगा. ईटी के मुताबिक केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिए ऋण लेकर स्वरोजगार करने वालों का आंकड़ा जोड़ने पर विचार किया जा रहा है. गौरतलब है कि श्रम ब्यूरो जो रोजगार पर आंकड़े जारी करता है, श्रम मंत्रालय के अधीन काम करता है. लेकिन अगर पिछले 4 साल में श्रम ब्यूरो ने जो आंकड़े जारी किये उसको देखकर ये कहा जा सकता है कि रोज़गार के मुद्दे पर मोदी सरकार फिस्सड्डी ही साबित हुई है. माना जा रहा है कि अगले साल यानी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले मोदी सरकार श्रम ब्यूरो के आंकड़ों को लोगों के सामने रखकर अपनी पीठ थपथपा सकती है.

दरअसल, यह प्रस्ताव तब आया जब रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि इस साल 55 लाख लोगों को कर्मचारी भविष्य निधि से जोड़ा जाएगा. ईपीएफओ में इतनी संख्या को जोड़ने का अर्थ सरकारी एजेंसियों ने इतनी नौकरियों के सृजन से लगाया था लेकिन आलोचकों का कहना है कि ईपीएफओ में नामांकन का मतलब नौकरी नहीं होता है. मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से ईटी के मुताबिक प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिए स्वरोजगार पाने वालों को देश में पहली बार जॉब डेटा में शामिल किया जाएगा. अगर ऐसा होता है तो नौकरीशुदा लोगों की मौजूदा संख्या 50 करोड़ में पांच करोड़ का इजाफा हो सकता है. यानी पांच साल में पांच करोड़ का रोजगार सृजन, जैसा कि पीएम मोदी ने वादा किया था.

गौरतलब है कि देश का कुल वर्कफोर्स 50 करोड़ है. इसका मात्र 10 फीसदी हिस्सा ही संगठित क्षेत्र से आता है. शेष 90 फीसदी का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से आता है, जहां ना तो उचित पारिश्रमिक दिया जाता है और ना ही कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा का ख्याल रखा जाता है. श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 में कुल 4 लाख 16 हजार लोगों के लिए रोजगार सृजन हुआ है. इनमें से 77 हजार पहली तिमाही में, 32 हजार दूसरी तिमाही में, 1 लाख 22 हजार तीसरी तिमाही में और 1 लाख 85 हजार चौथी तिमाही में रोजगार सृजन हुआ है.

दरअसल कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि पकौड़े की दुकान खोलना भी तो रोजगार है. उन्होंने एक रिपोर्ट के हवाले से यह भी दावा किया था कि पिछले साल करीब 70 लाख लोगों ने ईपीएफओ में रजिस्ट्रेशन कराया है. पीएम मोदी का तर्क था कि बिना नौकरी के लोग ईपीएफओ में क्यों रजिस्ट्रेशन कराएंगे. यानी उनके कार्यकाल में एक साल में 70 लाख लोगों को रोजगार तो मिला ही है. पीएम मोदी 2014 के चुनाव प्रचार में प्रति वर्ष एक करोड़ युवाओं को नौकरी देने का एलान किया था मगर विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार इस मुद्दे पर विफल रही है.(सौजन्य:जनसत्ता डॉट कॉम)

 
 
 
 
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