आ रहे हैं चुनाव, केम छो गुजरात? गुजरात भाग-2 Featured

04 Oct 2017
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आवाज़(मुकेश शर्मा,दिल्ली): हकीकत गुजरात की है, आमतौर पर कहानी शब्द का इस्तेमाल करता हूँ लेकिन अब कहानी बदली  बदली नज़र आ रही है तो फिर कहानी के बजाए हकीकत बोल रहा हूँ. पहले भाग में आपको बताया था की किस तरह से मेरे ड्राईवर राजेश जी ने मोदी जी के गुजरात से जाने के बाद सिस्टम के भी बदल जाने की बात की थी. कसूर शायद वहां के नेताओं का भी हो, और शायद ना भी हो. क्योंकि जिस तरह से मोदी ने गुजरात को संभाला उतनी अच्छी तरह से शायद उनके बाद के नेता आनंदीबेन या फिर वर्तमान मुख्यमंत्री नहीं संभाल पाए. खेर अब  फिर से कहानी को वहीँ से शुरू कर रहा हूँ जहाँ से छोड़ी थी. मेरी बात मेरे मित्र के मित्र से हो रही थी. जिन्होंने इशारों ही इशारों में ये कह दिया कि बदलाव हमेशा अच्छा होता है. मेरे मन में यही सवाल था कि क्या इस बार वाकई गुजरात कांग्रेस के साथ चलेगा? और दुविधा वही कि आप एक तरफ मोदी जी के साथ भी हैं और दूसरी तरफ बदलाव की बात कर रहे हैं. ये दोनों बातें एक समय में एक साथ कैसे हो सकती हैं. तो फिर मुझे उन मित्र से मेरे सवाल जवाब मिला, उन्होंने कहा की मुकेश जी हम लोग दिल से मोदी जी के साथ हैं. अकेला में ही नहीं बल्कि पूरा गुजरात. हमें मोदी के ऊपर गर्व है. आज गुजरात को दुनिया जानती है, पूरे देश में गुजरात का जलवा है. पहले हम अपने देश में जहाँ पर भी जाते थे और बोलते थे कि हम गुजरात से हैं तो बस लोग समझते थे की बिजनेसमैन हैं, लेकिन अब लोगों का रव्वये में फर्क आया है. आज जब भी कोई गुजरती कहीं पर बोलता है को वो गुजरात से है तो लोग उसकी बहुत इज्ज़त करते हैं. मोदीजी ने गुजरात की शान बढाई है. इसलिए हम उनकी इज्ज़त करते हैं. उनको मानते हैं और उनकी मानते हैं. लेकिन अगर आप चुनाव को लेकर पूछ रहे हैं तो में आपको बताना चाहता हूँ की अब यहाँ सब कुछ बदला बदला है. मोदी जी  के लिए नहीं लेकिन यहाँ की सरकार् के लिए. बीते कुछ समय में यहाँ वो सिस्टम नही  रहा जो मोदी जी ने सेट किया था. पार्टी में गुटबाजी हो गई है. कोई आनंदीबेन के खेमे का है तो कोई शाह के खेमे का है. लड़ाई नेताओं की है और पिस जनता रही है. लोगों को यहाँ के सिस्टम से बहुत शिकायतें हैं. सब लोग चाहते हैं की काश कोई मोदी जी की तरह फिर से सबकुछ ठीक कर दे. आम आदमी को  सरकार से कुछ नही चाहिए. बस उनके रोजमर्रा के छोटे मोटे काम बिना किसी भ्रष्टाचार के हो जाएँ. सरकारी दफ्तरों में उनकी फायलों को घुमाया ना जाए बल्कि समस्याओं का निपटारा हो जाए. फिर सब खुश हैं. लेकिन अब ऐसा हो नहीं पा रहा. जब भी किसी को कोई दिक्कत होती है तो सब मोदीजी के  शाशनकाल को याद करते हैं. जनता की उम्मीदें शायद ज्यादा हैं और यहाँ के नेताओं में इच्छा शक्ति की कमी. मैंने कहा कि वो सब तो ठीक है लेकिन मुझे मेरे सवाल का सही सही जवाब दीजिये अब बातों को गोल गोल मत घुमाइए. क्या इस बार आप और आपका गुजरात बदल जायेगा? क्या भाजप सत्ता से बाहर चली जाएगी? तो फिर जवाब मिला कि  जहाँ तक अब की बात है तो हाँ हम लोग भाजप के साथ नहीं चलेंगे. हालांकि हम अबतक कांग्रेस के पिछले शाशनकाल को भी नहीं भूले हैं, लेकिन हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है. दिल से हम कांग्रेस को भी नहीं चाहते पर करें तो क्या करें? आप बताइए. अब तस्वीर जो थोड़ी धुंधली धुंधली थी, साफ़ होने लगी थी. जवाब मिल रहा था. तो अब मैंने अपना ब्रह्माश्त्र फेंका. मैंने अगला सवाल किया. भाई साहब अंतिम सवाल आपसे ये है कि  चुनाव होगा तो प्रचार भी होगा, सब नेता आयेंगे तो मोदीजी भी आयेंगे. वो वोट भी मांगेंगे, फिर क्या करोगे? अब मैंने उन्हें उलझा दिया था. उनके चेहरे पर शिकन साफ़ नज़र आ रही थी. तो फिर उन्हें कहना ही पडा. बोले देखिये अगर मोदीजी मांगेंगे तो किस तरह मना कर सकते हैं. फिर तो साथ चलना ही पडेगा.

अब कुछ कहानी अपने क्लाइमेक्स तक पहुंची थी. मेरे सवाल का जवाब मिल गया था. की भई गुजरात के लोगों को चाहे सौ शिकायतें हों, लेकिन चुनाव में अगर मोदीजी कुछ मांगेंगे तो मिलेगा. यानी भाजप के लिए मोदी ब्रांड ही सबसे बड़ा ब्रांड रहेगा. उसके आगे सब फेल है. ना कोई प्लानिंग ना कोई पोलिसी. यहाँ सब इस बात से सहमत थे कि मोदी जी  के साथ तो चलना ही होगा, फिर चाहे जो भी हो. लेकिन उसके लिए मोदीजी को खुद ये आश्वासन देना होगा कि सबकुछ ठीक हो जायेगा. और आश्वासन ही नहीं सबकुछ ठीक करना भी होगा. हाँ सबने इतना जरुर स्वीकार किया की अब उतनी सीटें नहीं जीत पाएंगे जितनी मोदीजी के समय में आती थीं,लेकिन फिर भी भाजप मोदीजी के सहारे अपनी सरकार बना सकती है. खेर अब इन मित्रों से विदा लेने का समय था, तो वो चले गये. में भी गाँधी नगर की सडकें नापने के लिए निकला.शायद वहां कुछ लोग मिल जाएँ जिनसे पूछ सकूं ,की आखिर गुजरात में इस बार क्या होने वाला है. तो फिर फकीरा उठा और चल दिया सड़कों पर फिरने. बड़ा शांत सा शहर है गांधीनगर. आगे कुछ लोग मिले,मजदूर थे. उनसे पूछने की कोशिश की तो पता चला की मजदूर हैं बिहार से यहाँ काम करने आये हैं. उन्होंने कहा की साहब आप मार्किट जाओ वहां बहुत सारे लोग मिलेंगे. तो मैंने नजदीकी मार्किट पूछी तो उन्होंने बताया की सेक्टर 21 की मार्किट है यहाँ से कुछ दूर. आप पैदल पहुंच जाओगे. मैंने उन्हें अलविदा कहा और फिर सेक्टर 21 का रुख किया. अच्छी मार्किट है. मुझे भी अच्छी लगी. यहाँ पर कुछ लोग मिले बहुत खुशमिज़ाज, मधुरस्वभाव और बाहर से कोई आया हो तो जैसे उसके लिए अपनी जान कुर्बान कर देंगे. वाह रे गुजरात. दिल खुश हो गया. जैसे ही उन लोगों को पता चला की में दिल्ली से आया हूँ और चुनावों के बारे में पूछ रहा हूँ तो आसपास हजूम लग गया. सब अपने मन की बात कहना चाहते थे. अब पता लगा की हमारे प्रधानमंत्री ही अपने मन की बात नहीं कहते बल्कि इस काम में सारे गुजरती उस्ताद हैं.

खेर सवाल जवाब का सिलसिला शुरू हुआ. मैंने पूछा कि इस बार आपलोग किस को वोट देंगे. तो बोले की हम आपको क्यों बताएं. जिसको  दिल करेगा दे देंगे. अब में गुजरातियों के स्वभाव को  थोडा थोडा समझने लग गया था. इनको बातों को घुमाना बहुत अच्छी तरह से आता है.पर में  भी कहाँ हार मानने वाला था. मैंने कहा कि पूरा देश जानना चाहता है कि इस बार गुजरात में क्या होने वाला है. और इस से भी बात नहीं बनी तो मैंने कहा की भाई कुछ बता दो नहीं तो मेरी  नौकरी चली जायेगी. मेरे बीवी बच्चे भूखे मर जायेंगे. तो उनका दिल पिघल गया. एक साहब जो वहां खाना खाने आए थे बोले मुकेश दिल करता है कि भाजप के  साथ चलें लेकिन दिमाग बोल रहा है कि इस बार बदल दो सरकार. अभी ये तय नहीं हो पा रहा है कि दिल की सुनें या फिर दिमाग की, और ये हालात मेरे नहीं बल्कि सारे गुजराती समाज की है. हम सब मोदीजी को चाहते हैं. हमें उनपर नाज़ है. लेकिन यहाँ की सरकार के कामकाज से हम खुश नहीं हैं. कुछ लोग शायद कांग्रेस की तरफ जायेंगे. पूरा मन बना लिया है. लेकिन मेरे जैसे लोग अभी भी दुविधा में हैं. और ये हकीकत भी है कि हमसब अभी तक कांग्रेस के पिछले शाशनकाल को नहीं भूले हैं. इसलिए रिस्क लेंने से भी डर रहे हैं. लेकिन राहुल अब जबसे आये हैं तो कुछ बदले बदले नज़र आ रहे हैं. अपनी ही सरकार की आलोचना कर रहे है. साफ़ कह रहे हैं कि हम में अहंकार आ गया था. अब सब ठीक होगा.गुजरात की सरकार् गुजरारती चलाएंगे. सुनने में अच्छा लाग रहा है. पर कितना विश्वास करें ये समझ नहीं रहा. में समझ गया  कि राहुल गाँधी अपनी प्लानिंग में कामयाब तो हो रहे हैं लेकिन अभी पूरी तरह से नहीं. सवाल बहुत सारे थे. मैंने अगला सवाल पूछा कि पटेल समुदाय क्या करने वाला है? क्या आरक्षण का मुद्दा रहेगा इस बार के चुनाव में. तो एक साहब बोले में पटेल हूँ औए मेरा मानना है कि जरुर रहेगा. हम हमेशा से बीजेपी को वोट करते आये हैं. क्योंकि हम व्यापारी लोग हैं तो बहुत सारे लोग हमारे यहाँ काम भी करते हैं. हमारे कहने पे वोट भी देते हैं. लेकिन जिस तरह से पिछले दिनों के घटनाक्रम हुए हैं उस से हमारा समुदाय बीजेपी से खुश नहीं है. हाँ अगर कोई पार्टी किसी पटेल को मुख्यमंत्री बनाये  तो हम जरुर उसके साथ चलेंगे. फिर  चाहे वो बीजेपी हो या कांग्रेस. यहाँ हार्दिक पटेल के बारे में पूछना जरुरी  था, क्योंकि उनकी दोस्ती भी आजकल राहुल के साथ देखने को मिल रही है. मैंने बोला की आपके तो सबसे बड़े नेता हार्दिक पटेल हो गये हैं ना. तो जवाब मिला कि नहीं. एक समय था जब हम सब हार्दिक के साथ थे. उसने जब आरक्षण का मुद्दा बनाया तो हम साथ हो लिए. लेकिन अब और नहीं. उसने बहुत पैसा बनाया. हमारे नाम पर पॉलिटिक्स करी. और भी कई पटेल हैं.. सब पार्टियों में हैं.  अच्छे नेताओं की क्या कोई कमी है? उनको बनाओ. अब हार्दिक का जादू फीका पड़ गया है. आप किसी पटेल को मुख्यमंत्री घोषित करो फिर  देखो तमाशा. कैसे आपकी सरकार बनेगी.

मेरा अगला सवाल बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में था. मैंने बोला कि अमित  शाह तो पूरे देश को जीत रहे हैं. ऐसे में गुजरात उनके बारे में क्या सोचता है. तो लोग बोले की  अमित शाह को यहाँ ज्यादा नहीं पूछते. यहाँ तो सब मोदी मोदी है. आनंदीबेन के बाद यहाँ अगला मुख्यमंत्री पटेल ही बनता लेकिनं अमित शाह ने नहीं बनने दिया. तो हम अमित शाह के बार में ज्यादा ना सोचते हैं और ना ही बोलेंगे. मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया था कि भई यहाँ के लोग खासकर पटेल समुदाय अमित शाह को शायद उतना पसंद नहीं करता, और उन्हें ये लगता है की  अमित शाह पटेल समुदाय के उतने हितेषी नहीं हैं. फिर अंतिम सवाल किया क्योंकि वक़्त की बहुत कमी थी. मैंने बोला कि अब साफ़ साफ़ बताइए  कि अगर मोदीजी आकर आपसे वोट  मांगते हैं तो आप क्या करेंगे. तो वहां खड़े व्यक्ति जो सिर्फ हमारी बात सुन रहे थे बोले कि देखिये  भई मुकेश. आज ये लोग चाहे कितने भी दुखी हों. और हकीकत में हैं भी. क्योंकि ये मौजूदा सरकार के हर काम को मोदीजी के काम से तुलना करते हैं. फिर इन्हें लगता है कि दूसरे उनके बराबर नहीं  हैं. और ये सच भी  है.  मोदीजी के साथ किसी और की तुलना की भी नहीं जा सकती. लेकिन मुझे ये पता है की हैं जब मोदीजी आयेंगे और इनसे वोट मांगेंगे तो ये सब लोग जो अभी कुछ भी बोल रहे हैं वो सब मोदीजी के साथ हो लेंगे. हाँ इतना जरुर है कि बीजेपी उतनी सीटें नहीं जीत पायेगी जितनी  उनके समय में जीत जाती थी लेकिन सरकार बना लेगी. ये सौ बातों की एक बात है. बहरहाल अब रात हो चुकी थी और में भी इस नतीजे पे पहुंच चुका था कि एक बात तो तय है कि लोग गुस्से में हैं. सरकार के काम से खुश भी नहीं हैं. लेकिन मोदी के नाम पर गुजरात आज भी एक है. जब मोदी आयेंगे तो सब फिर से उनके पीछे चल  देंगे ये बात तय लग रही थी.  हर आदमी ये चाह रहा है बस एक बार मोदी जी आ जाएँ. उनसे बात करें. उन्हें मनाएं. फिर बात बन् जायेगी. मेरा आज का दिन और लोगों से बातचीत का संमय समाप्त हो चुका था. तो वापिस अपने ठिकाने पे लौटना ही मुनासिब था. में फिर चल दिया अपनी म्मंज़िल की और इस उम्मीद के साथ कि कल  फिर निकलूंगा किन्ही गलियों में, लोगों से मिलूँगा. बात करूंगा और ये जानने की क्कोशिश करूंगा की जो ये गांधी नगर शहर लोग सोचते हैं, क्या वही सारा गुजरात सोचता है? आपको भी बताऊंगा, लेकिन कीजिये थोडा सा इंतजार...नमस्कार.

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