काला पानी की सज़ा काटने को मजबूर हिमाचल के जमरेलावासी, उम्मीद अब केवल प्रधानमंत्री मोदी से....... Featured

20 Jan 2019
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विधायक और प्रशासन मस्त, जनता कर रही त्राहि-त्राहि, ठेकेदार और आला अफसरों की मिलीभगत से सरकार को लगा करोड़ों का चूना.....!

 

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): हम आज़ाद हैं...आजादखयाल हैं और अपनी इस आज़ादी के महत्व को समझते हैं.... सरकार की अहमियत को समझते हैं अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों को लेकर सजग हैं.... कहीं कुछ गलत हो रहा हो तो अपनी आवाज़ भी उठाते हैं... लेकिन अगर आवाज़ उठाई जाए फिर भी समस्या न सुलझाया जाए, आपकी आवाज़ को अनसुना करके आपको डराया और धमकाया जाए.... सरकार और स्थानीय नेता, एमएलए अपने मस्त रहें और जनता त्राहि-त्राहि करे तो क्या वाकई हम अपने आप को आज़ाद कह पायेंगे..... ऐसा ही कुछ हो रहा है हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ तहसील के जमरेला  वासियों के साथ..... ये लोग आज काला पानी की सजा काटने को मजबूर हैं.... और ऐसी घटनाएं ही सवालिया निशाँ खड़ा करती हैं उन सरकारों के ऊपर जो सबका साथ-सबका विकास करने की बातें करती हैं.... 

कहानी शुरू होती है हिमाचल प्रदेश की बैजनाथ तहसील के जमरेला गांव से....बल्कि ये कहानी नहीं हकीकत है जमरेला गांव की जो सुविधाओं के नाम पर काला पानी से किसी भी अंदाज़ में कम नहीं है.... यहां के लोग भोले-भाले और सीधे साधे हैं..... वोट तो नेता आकर ले जाते हैं पर इस गांव में सुविधाओं के नाम पर सिर्फ आश्वासन ही मिलते हैं.... फिर शायद इस गांव की याद उन्हें अगले चुनाव में ही आती है.... आज इस गांव में सड़क तक नहीं है... जो कच्ची सड़क बनी थी वो भी पिछली बरसात में बह गई.... सम्पर्क पूरे क्षेत्र से टूट गया है.... बड़े लोग तो फिर भी किसी तरह अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करके अपने काम पर पहुँच रहे हैं, लेकिन बच्चे स्कूल तक नहीं जा पा  रहे हैं...... कहने के लिए तो एक बांस का छोटा सा पुल जिसे स्थानीय भाषा में त्रगड़ी कहते हैं वो बना दिया गया है लेकिन सुबह के वक़्त जैसे ही उस पुल पर ओस पड़ती है तो फिसलन से कई बार हादसे हो जाते हैं और जान जाते जाते बचती है.... पर किसी को परवाह नहीं है..... शिकायतें स्थानीय विधायक से बार बार की गई लेकिन असर निल्ल वटे सन्नाटा ही नजर आया है...स्थानीय लोगों की मानें तो विधायक को उनके गांव की याद बस चुनाव में आती है.... उसके बाद उन्होंने इस गांव को भुला ही दिया है... शिकायत करने जाओ तो केवल आश्वासन ही मिलते हैं.... काम होता नहीं...... कह सकते हैं कि सरकार और स्थानीय अधिकारी अपने कमरों में मस्त हैं और जनता त्रस्त है....जिस सरकार की प्राथमिकता सबका विकास की हो उसके राज में अगर हालत ऐसे हों तो वाकई घटना दुखद है...... .यानी सरकार का सबका साथ सबका विकास का नारा यहाँ पूरी तरह से फेल ही नजर आता है.....

ठेकेदार और स्थानीय प्रशासन गांव की बदहाली के जिम्मेवार, करोड़ो का हुआ घोटाला.....

आवाज़ न्यूज़ नेटवर्क ने जब स्थानीय लोगों से बात की तो पता चला कि ऐसा नहीं है कि सड़क इस गांव में नहीं थी... सरकार ने करोड़ों रूपए खर्च करके सड़क तो बनाई लेकिन जिस तरह से वो सडक बनी वो कागजों पर ज्यादा थी और ज़मीन पर कम.... पुल भी बनाया गया लेकिन वो भी कागजों पर ज्यादा मजबूत था धरातल पर कम.... पिछली बरसात का पानी धरातल पर बनी सडक और पुल को बहा ले गया लेकिन कागजों पर आज भी ये सड़क और पुल मजबूत हैं.... यानी जाहिर तौर पर इसकी जांच कराए जाने की आवश्यकता है क्योंकि इतनी शिकायतों के बाद भी अगर समस्या का निपटारा नहीं हो पा रहा तो कहीं दाल में कुछ काला तो जरुर है... स्थानीय लोगों की मानें तो ठेकेदार ने सड़क बनाते वक़्त सारे नियम क़ानून को टाक पर रखकर काम किया... बात बात पर अपनी ऊँची पहुंच की धौंस जमाता था.... और अगर फिर भी बात न बने तो डराना धमकाना और उंची पहुंच का हवाला देना उसके लिए आम बात थी......

 

कांग्रेस सरकार के कारनामों की सजा भुगत रहे हैं जमरेलावासी, हमारी सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर, जल्द होगा समाधान: मुल्ख राज प्रेमी(स्थानीय विधायक)

जब आवाज़ न्यूज़ नेटवर्क ने इस मुद्दे को लेकर स्थानीय विधायक से बात की तो उन्होंने इसका ठीकरा पिछली सरकार के सर पर फोड़ते हुए कहा कि जमरेला वासीयों की इस तकलीफ की वजह पिछली कांग्रेस सरकार है.... उन्होंने जो पुल बनाया उसकी ड्राइंग तक ढंग से तैयार नहीं की गई थी.... हमनें सत्ता में आते ही जमरेला के लिए सड़क को ढंग से तैयार करवाया और वहां पर सुचारू रूप से बसें भी चलना शुरू हो गई थीं... लेकिन बरसात में पुल बह गया और ज्यादा बरसात होने के कारण सड़क भी जगह-जगह से टूट गई है.... लेकिन उन्होंने इस समस्या के निदान से मुख्यमंत्री से बात की है और जल्द ही सरकार जमरेला वासियों को मुख्यधारा में वापिस ले आएगी......

अब उम्मीद केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से.....

स्थानीय लोगों की मानें तो गांव को मुख्य धारा में जोड़ने के लिए उन्होंने अपनी तरफ से साड़ी कोशिशें करके देख ली हैं... स्थानीय अधिकारियों से लेकर एमएलए तक की चौखट पर वो कई बार अपनी नाक रगड़कर थक गये हैं.... पर सबने जैसे अपने कानों में रुई डाल रखी है.... भैंस के आगे जितनी मर्ज़ी बीन बजाओ कुछ असर ही नहीं होता..... अब उम्मीद केवल देश के प्रधानमंत्री मोदी से बची हुई हैं.... वो ही उनका कुछ भला कर सकते हैं.... हिमाचल की सरकार ने तो उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया है.....

 

 

 

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