हिमाचल प्रदेश की राजनीति से वीरभद्र और धूमल युग का अंत, दोनों ही पार्टियों में होगा नया सूर्य उदय.....

19 Dec 2017
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आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): हिमाचल प्रदेश की राजनीति में वीरभद्र सिंह यानी राजा साहब और प्रेम कुमार धूमल का नाम बड़े ही अदब से लिया जाता है. पिछले 20 साल में हिमाचल प्रदेश की राजनीति इन्हीं दो नामों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. कभी धूमल वीरभद्र पर भारी पड़े तो कभी वीरभद्र धूमल पर. पर राजनीतिक वर्चस्व दोनों का ही कायम रहा या यों कहें की हिमाचल प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस में अंदर वीरभद्र के बिना और बीजेपी के अंदर धूमल की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिला. लेकिन कहते हैं न कि वक़्त बड़ा बलवान होता है. इस बार वक़्त ने ऐसा खेल रचा कि दोनों के दोनों दिग्गज़ अपने लक्ष्य को साधने में फेल हो गये. यानी इस बार दोनों अपने राजनीतिक इम्तिहान में फेल हो गये. धूमल सब जीत कर भी सब हार गये. वहीँ राजा साहब अपनी सीट तो जीत गये लेकिन फिर भी सत्ता की बाज़ी हार गये. जिसके बाद ये कयास लगाये जा रहे हैं कि अब हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इन दोनों योद्धाओं के युग का अंत हो गया है और इस बार से हिमाचल प्रदेश की राजनीति में नया सूर्योदय होगा.

सबसे पहले अगर बीजेपी की बात करें तो इस बार के हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनावों में बीजेपी की जीत तो हुई लेकिन मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल के चुनाव हारने की वजह से इसका सारा मजा किरकिरा हो गया.  जिसके बाद अब सीएम पद के लिए नए दावेदारों के नाम सामने आने लगे हैं. इनमें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा का नाम सबसे ऊपर है. उनके अलावा पार्टी के सीनियर नेता जयराम ठाकुर भी रेस में हैं. हालांकि इस बीच फिर से धूमल के सीएम बनने की संभावनाएं दिखने लगी हैं. धूमल के पुराने वफादार और उनकी सरकार में मंत्री रहे वीरेंद्र कुमार ने धूमल के लिए अपनी सीट कुर्बान करने का ऑफर दिया है. कुमार राज्य में तीन बार कानून मंत्री रहे हैं. उन्होंने कुटलेहार से विधान सभा चुनाव जीता है. लेकिन सूत्रों की मानें तो धूमल के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं अब न के बराबर ही नज़र आ रही हैं. क्योंकि पार्टी हाई कमान में उनके लिए लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं है साथ ही हिमाचल में बैठे शांता कुमार भी कभी नहीं चाहेंगे कि धूमल को हारने के बाद भी सत्ता की बागडोर सौंप दी जाए. 

गौरतलब है कि इस बार बीजेपी से जीतकर आये विधायकों में शांता कुमार गुट के विधायक अधिक हैं, और वो कभी नहीं चाहेंगे की धूमल को मुख्यमंत्री पद ऐसे वक़्त में दिया जाए जब वो खुद अपना चुनाव हार गये हैं. ऐसे में पार्टी से अभयदान मिलने की स्थिति में ही धूमल को विधायक दल का नेता चुना जा सकता है. हालांकि, उनकी राह का पहला रोड़ा उनके सहयोगी वीरेंद्र कुमार ने हटाया तो है, लेकी मंजिल अभी बहुत दूर है. दरअसल हिमाचल प्रदेश में एक सदनी व्यवस्था है. यानी वहां सिर्फ विधान सभा है, विधान परिषद नहीं. इसलिए बैकडोर एंट्री की संभावनाएं नहीं है. ऐसे में अगर पार्टी चाहेगी तभी धूमल सीएम बन सकेंगे क्योंकि किसी भी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनने के छह महीने के अंदर फिर से चुनाव लड़कर सदन में पहुंचना होता है. सूत्र बताते हैं कि 73 साल के धूमल के सीएम बनने की संभावनाएं लगभग खत्म सी हो गई हैं क्योंकि वैसे भी धूमल पार्टी के तथाकथित रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच चुके हैं. अगर वो मुख्यमंत्री बनते भी हैं तो इस लिहाज से भी उनका कार्यकाल केवल  दो साल का ही हो सकता है.जिसके लिए शायद ही पार्टी आलाकमान राज़ी हो. दूसरी बड़ी बात कि पार्टी की ऐसी कोई मजबूरी फिलहाल नहीं दिखती कि वो फिर से धूमल के नाम पर विचार करे. लिहाजा, सहयोगी की कुर्बानी के बावजूद शायद ही पार्टी धूमल को अभयदान दे सके. अगले एक-दो दिन में पार्टी के पर्यवेक्षक रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर शिमला जाकर नव निर्वाचित विधायक दल का नया नेता चुनने की औपचारिकता पूरी करेंगे. 

तमाम हालात के मद्देनजर ऐसा कहा जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश की राजनीति से अब धूमल युग का अंत हो गया है और बीजेपी पूरी तरह से बदली-बदली नज़र आ रही है जो धूमल के बिना आगे बढ़ना ज्यादा पसंद करेगी. ऐसे में जे.पी. नड्डा और जयराम ठाकुर जैसे नेताओं का नाम आगे आ गया है जिन्हें मुख्यमंत्री पद सौंपा जा सकता है. ऐसे में मुझे वो वक़्त याद आ रहा है जब हिमाचल बीजेपी में शांता युग की समाप्ति हुयी थी और नई बीजेपी यानी धूमल युग की शुरुआत हुई  थी. अब इतिहास अपने आप को दोबारा दोहरा रहा है. अब शांता कुमार परदे के पीछे हैं. लेकिन वो सब हालात पर नज़र बनाये हुए होंगे. क्योंकि धूमल के दर्द को उनसे बेहतर कोई नहीं समझ नहीं सकता, वो इन हालातों से बहुत पहले गुज़र चुके हैं जिन से धूमल आज गुज़र चुके हैं.

वहीँ बात कांग्रेस के दिग्गज़ नेता वीरभद्र सिंह की करें तो यशवंत सिंह परमार के बाद हिमाचल का सरदार(मुख्यमंत्री) बनने के बाद से ही वीरभद्र सिंह का नाम  हिमाचल प्रदेश में राजनीति का पर्याय बन गया. फिर चाहे वो इंदिरा गाँधी का समय हो या फिर उनके बाद राजीव गाँधी से लेकर अब राहुल गांधी के दौर की कांग्रेस . वीरभद्र सिंह हिमाचल में कांग्रेस का दूसरा नाम बन गया. कांग्रेस ने भी उन्हें अपने सर-माथे पर बैठाया और उन्होंने भी पार्टी को निराश नहीं किया 6 बार मुख्यमंत्री बने. पार्टी के अंदर यों तो कई बार विरोध के स्वर उठे लेकिन किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई की वो राजा साहब के खिलाफ विद्रोह कर सके. लेकिन कहते हैं न कि वक़्त सबसे बड़ा बादशाह है. उसने ऐसा खेल रचा कि इस बार राजा साहब को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जब कांग्रेस खुद बदलाव के दौर से गुज़र रही है. हालांकि वीरभद्र सिंह खुद के लिए इस चुनाव को अपनी अंतिम पारी घोषित कर चुके थे. लेकिन अब उनके सामने अपने सुपुत्र विक्रमादित्य सिंह को राजनीति में स्थापित करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. हालांकि विक्रमादित्य विधायक तो बन गये हैं लेकिन इस बार के चुनाव में वीरभद्र सिंह के गुट के बड़े-बड़े सुरमा धराशायी हो गये हैं जिसके कारण उनकी पार्टी और संगठन में पकड़ काफी ढीली हो गयी है.

दरअसल वीरभद्र सिंह के राजनीतिक सूर्यास्त का अंदाज़ा उसी समय लग गया था जब इस बार के विधानसभा चुनाव में पार्टी उन्हें बागडोर नहीं सौंपना चाह रही थी और आलाकमान ने वीरभद्र सिंह के तमाम प्रयासों के बावजूद प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू को हटाने से मना कर दिया था. मतलब साफ़ है कि अब हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस में भी भारी बदलाव देखने को मिलेंगे फिर चाहे वो पार्टी के अंदर हों या फिर संगठन. और वैसे भी सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि प्रेम कुमार धूमल को धूल चटाने के बाद राजिंदर राणा प्रदेश कांग्रेस में सबसे बड़े नेता बनकर उभर सकते हैं. कांग्रेस भी उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने पर गंभीरता से विचार कर रही है. ऐसे में तमाम समीकरणों को धयान में रखते हुए ये कहा जा सकता है कि हिमचल प्रदेश में इस बार की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है. यानी धूमल और वीरभद्र युग का अंत होने जा रहा है और दोनों ही पार्टियों में नए राजनीतिक खिलाड़ी आगे आने वाले हैं. 

 

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