हरियाणा: क्या हरियाणा कांग्रेस के छुपे रुस्तम साबित होने वाले हैं कुलदीप बिश्नोई?

03 Feb 2018
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आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): जब से कुलदीप बिश्नोई कांग्रेस में वापिस आये हैं तब से ये कयास लगाये जा रहे हैं कि वो हरियाणा कि राजनीति में कोई अहम रोले अदा करेंगे. पिछले काफ़ी समय से गांधी परिवार से भी उनकी नजदीकियां दिखीं और उन्होंने कई मौकों पर जाकर गांधी परिवार से मुलाकात की. वो उनके हर सुख-दुःख में सरीक हुए.जब सोनिया गांधी बीमार हुईं तो हरियाणा से वो एक ऐसे नेता थे जो उनसे मुलाकात करने पहुंचे और उनका कुशलक्षेम जाना. तब इस सम्भावना को और बल मिला कि कुलदीप को इन नजदीकियों का फायदा मिलेगा और उन्हें कोई अहम जिम्मेवारी सौंपी जा सकती है. लेकिन प्रदेश में कांग्रेस कि बात करें तो ये साफतौर पर दो गुटों में ही बनती नजर आई. जिसमे हुड्डा और तंवर खेमा आपसी खींचतान में लगा रहा. फिर राहुल गांधी ने संगठन में यथास्थिति बनाकर जहाँ तंवर खेमे को संजीवनी प्रदान कर दी वहीँ हुड्डा खेमा अब भी इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही राहुल पार्टी और संगठन में फेरबदल करेंगे और कमान उनके हाथों में सौंपी जा सकती है. इस सब के बीच कुलदीप ज्यादातर चुप रहे और इसी ख़ामोशी के बीच अपना काम करते रहे.

अब हालात बदले-बदले नजर आ रहे हैं. लड़ाई अब भी तंवर और हुड्डा खेमे के बीच ही है लेकिन इस सब के बीच कुलदीप सबके लिए ख़ास बनते जा रहे हैं. इसका एक उदहारण तब देखने को मिला जब चौधरी भूपिंदर सिंह हुड्डा के सांसद सुपुत्र दीपेंदर सिंह हुड्डा अचानक से कुलदीप बिश्नोई के बड़े भाई चन्द्र मोहन बिश्नोई के घर मुलाकात करने पहुंचे और दोनों के बीच बंद कमरे में लगभग 45 मिनट तक चर्चा हुई.

जानकारों कि मानें तो यही वो क्षण था जिसने हरियाणा कांग्रेस में कुलदीप के बढ़ते कद को साबित किया. दीपेन्द्र के चंदर मोहन से मुलाकात करना अपने आप में काफ़ी कुछ कहता है. कई लोगों ने इतना तक कहा कि कुलदीप और हुड्डा ने तंवर खेमे को परस्त करने के लिए आपस में हाथ मिला लिया है क्योंकि भूपिंदर सिंह हुड्डा पिछले काफ़ी समय से तंवर को पछाड़ने कि कोशिश कर रहे हैं लेकिन हर बार नाकाम साबित हो रहे हैं ऐसे में वो कुलदीप के साथ हाथ मिलाकर तंवर को परस्त करने के चक्कर में हैं. यानी ये कहा जा सकता है कि हुड्डा और कुलदीप मिलकर तंवर कि राजनीति से पार पाएंगे और हरियाणा कांग्रेस के तख्तोताज़ पर काबिज़ होंगे. लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि कुलदीप इस सब में हुड्डा का साथ क्यों देंगे? क्योंकि मुझे आज भी याद है कि जब मैंने एक चैनल के लिए भिवानी में कुलदीप बिश्नोई का इंटरव्यू किया था और तब कुलदीप बिश्नोई हजकां प्रमुख थे तो उन्होंने साफ़ तौर पर हुड्डा पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था और कहा था कि वो हुड्डा को मुख्यमंत्री के पद से उखाड़ फेंकेंगे. तो क्या माना जाए कि कभी एक-दुसरे के धुरविरोधी रहे हुड्डा और कुलदीप आज एक साथ हो गये हैं? और अगर हो गये हैं तो इसमें कुलदीप का क्या फायदा है? और ऐसा कहा भी जाता है कि  राजनीति में कोई भी परमानेंट दोस्त या दुश्मन नहीं होता. जानकार भी ऐसा ही कह रहे हैं कि कल तक के जो दुश्मन थे वो आज एक हो गये हैं. लेकिन सवाल फिर से वही है कि हुड्डा तो कुलदीप का सहारा लेकर शायद तंवर खेमे को परस्त करने में कामयाब हो जायेंगे और हो भी सकता है कि हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष पद पर काबिज़ हो जायेंगे लेकिन कुलदीप इस सब में हुड्डा का साथ क्यों देंगे?

सूत्र बताते हैं कि हुड्डा और कुलदीप में इसके बारे में डील हो गयी है. कुलदीप को केंद्र कि राजनीति में भेजा जा सकता है जिसमें हुड्डा खेमा उनका साथ देगा और अगर अगले चुनाव में हुड्डा सत्ता में वापसी करते हैं तो फिर से चन्द्र मोहन को उप-मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. इसी डील के मद्देनजर दोनों मिलकर काम करेंगे. लेकिन सवाल फिर वहीँ का वहीँ आकर खड़ा हो जाता है कि केंद्र कि राजनीति में कुलदीप क्या करेंगे? सत्ता का सुख तो फिर से हुड्डा ही भोगेंगे और चन्द्र मोहन उप-मुख्यमंत्री होकर भी हुड्डा के ही इशारों पर नाचेंगे. तो फिर कुलदीप को इस सब के बीच क्या फायदा हुआ? मतलब दलील कुछ ख़ास गले नहीं उतर रही. 

मतलब साफ़ है कि कुलदीप राजनीति के एक मंझे हुए खिलाड़ी कि तरह अपना दांव खेल रहे हैं और वो इस सब में न तो कोई जल्दबाजी दिखाना चाहते हैं और न ही ऐसा कोई कदम उठाना चाहते हैं जिससे पार्टी हाई कमान में उनकी तरफ से कोई गलत मेसेज जाए. जैसा कि तंवर और हुड्डा खेमे कि तरफ से अक्सर जाता रहा है. जब भी दोनों एक दूसरे के सामने आये हैं तो कांग्रेस की मजबूती के बजाये फजीयत ही हुई है. इतना ही नहीं कई बार तो दोनों खेमों में इस तरह से झड़प हुई कि एक दूसरे के सर तक फूट गये. कुलदीप ने अपने को अभी तक सिर्फ अपने क्षेत्र तक ही सीमित रखा है और वो किसी भी खेमे का हिस्सा बनने से कतरा रहे हैं. वो जब भी मीडिया से भी रु-ब-रु हुए हैं तो सिर्फ उन्होंने हरियाणा में कांग्रेस कि मजबूती कि ही बात की है. इसके अलावा वो गुटबाजी जैसे सवालों से बचते ही नजर आये हैं. कई लोगों ने तो बड़बोले कुलदीप का इस तरह के सवालों से बचने पर हैरानी भी जताई थी कि कुलदीप क्यों किसी पर कोई ऊँगली नहीं उठा रहे हैं. लेकिन राजनितिक पंडितों कि मानें तो कुलदीप इस बार बदले-बदले नजर आ रहे हैं. अपनी पिछली गलतियों से सबक लेते हुए कुलदीप ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहते जो पार्टी आलाकमान के आगे उनके प्रति संदेह पैदा करे.

यानी कुलदीप पूरी तरह से राजनीतिज्ञ बन चुके हैं, और एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ कि तरह अपनी एक-एक चाल चल रहे हैं. राजनितिक पंडितों कि मानें तो कुलदीप कि नज़र मछली कि आँख पर है. अब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बन चुके हैं और सबको मालूम है कि राहुल अपने करीबी लोगों को संगठन में तरजीह देंगे. ऐसे में कुलदीप वो ये भली भाँती मालूम है कि हरियाणा में उन्हें चुप-चाप अपना काम करना है और बिना किसी खेमेबाजी के आगे बढ़ना है. हालांकि उन्हें ये मालूम है कि तंवर भी टीम राहुल का ही हिस्सा हैं लेकिन उनकी और हुड्डा कि लड़ाई का सीधा फायदा कुलदीप को ही होगा. और वैसे भी कुलदीप को हुड्डा और तंवर ग्रुप कि कम जरूरत है जबकि इन दोनों को कुलदीप की ज्यादा. ऐसे में कुलदीप कि पहली निगाह हरियाणा कांग्रेस का अध्यक्ष पद है और बाद में मुख्यमंत्री पद. उन्हें ये अच्छी  तरह पता है कि बीजेपी हरियाणा में अगर सत्ता में काबिज़ है तो उसमे गैर जाट वोट बैंक ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी. ऐसे में कांग्रेस आलाकमान की रणनीति बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए गैर जाट  वोट बैंक पर केन्द्रित रहेगी. ऐसे में कुलदीप कांग्रेस के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं. क्योंकि सूबे में गैर जाट अगर कोई सबसे बड़ा चेहरा है तो वो कुलदीप बिश्नोई ही है. उनके पिता भजन लाल इस वोट बैंक के सूत्रधार थे और आज भी सूबे में ऐसे अनगिनित लोग हैं जो इस परिवार में आस्था रखते हैं और कुलदीप बिश्नोई उन सब के एकमात्र नेता हैं. कुलदीप इसी रणनीति पर अपना धयान केन्द्रित कर आगे बढ़ रहे हैं और उन्हें पता है इसका फायदा उन्हें देर-सवेर मिलना ही है.

अब बात हुड्डा और कुलदीप कि डील कि कर लेते हैं. हालांकि इसकी उम्मीद बहुत कम है लेकिन फिर भी अगर कुलदीप और हुड्डा के बीच में डील होती है तो सिर्फ एक ही बात को लेकर हो सकती है कि हुड्डा खेमा कुलदीप बिश्नोई को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर विराजमान करने के लिए राज़ी हो जाए. जिसकी सम्भावना अब दीपेन्द्र हुड्डा और चंद्रमोहन बिश्नोई कि मुलाकात के बाद बनने लगी है. साथ ही समझौता इस बात को लेकर भी होगा कि दोनों साथ मिलकर काम करेंगे और अगर चुनाव के बाद पार्टी  जाट चेहरे को सूबे का प्रतिनिधित्व देती है तो हुड्डा प्रदेश कि कमान संभालेंगे और अगर गैर जाट को प्रतिनिधित्व मिलता है तो हुड्डा खेमा कुलदीप बिश्नोई का साथ देकर उन्हें सत्ता कर काबिज़ होने में मदद करेगा. यानी अगर हुड्डा मुख्यमंत्री बनते हैं तो चंद्रमोहन बिश्नोई उप-मुख्यमंत्री और कुलदीप मुख्यमंत्री बनते हैं तो फिर दीपेन्द्र हुड्डा उप-मुख्यमंत्री बन सकते हैं.

राजनितिक पंडितों के मुताबिक अब कुलदीप जल्द ही नये अंदाज़ में नयी भूमिका के साथ नजर आ सकते हैं. लेकिन जिम्मेवारी बड़ी होगी तो फिर आगे बढ़ने में दिक्कतें भी उतनी ही आएँगी. एक तरफ कांग्रेस कि गुटबाजी से पार पाना है साथ ही अपने ही विरोधियों को साथ लेकर भी चलना है. मतलब लड़ाई पहले तो अपने घर में लड़नी है फिर उसके बाद बीजेपी से. इस सब में वो कितने कामयाब हो पाते हैं ये तो वक़्त ही बतायेगा लेकिन इतना साफ़ है कि हरियाणा कि राजनीति में कुलदीप आगे बढ़ रहे हैं जिसका आभास बीजेपी के साथ साथ उनके अपने सहयोगियों को भी हो चला है.

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