लगातार 11वें दिन भी बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, सरकार बोली: नहीं घटा सकते.......

24 May 2018
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आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): दिनोंदिन बढ़ते पेट्रोल-डीज़ल के दामों ने भले ही आम आदमी(आम नागरिक) की नींद उड़ा रखी हो लेकिन सरकार के कान तले जूं रेंगती नजर नहीं आ रही है और फिलहाल इन बढ़ते दामों से राहत मिलने के आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं. आज सरकार ने लगातार 11 वें दिन भी पेट्रोल-डीज़ल के दामों में बढ़ोतरी की. दिल्ली में पेट्रोल की वर्तमान कीमत 76.87 प्रति लीटर है जबकि डीज़ल की कीमत 68.08 रूपए प्रति लीटर है. ऐसे में आम आदमी कैसे गुज़ारा करे उसे समझ नहीं आ रहा है. वहीँ सरकार की तरफ से साफतौर पर ये इशारा कर दिया गया है कि पेट्रोल डीज़ल के दाम कम नहीं किये जा सकते.

इंडियन एक्सप्रेस की मानें तो इस मामले में जब केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता नितिन गडकरी से पूछा तो उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि पेट्रोल डीज़ल के दाम कम नहीं किये जा सकते क्योंकि ये सीधे-सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ मामला है. ये न टाली जा सकने वाली स्थिति है. अगर हम महंगे दामों पर पेट्रोल डीज़ल खरीदते हैं और फिर उसे सस्ता बेचते हैं तो उसपर हमें सब्सिडी देनी पड़ेगी जिसका सीधा असर सरकार की समाज कल्याण की योजनाओं पर पड़ेगा.

गडकरी ने साफ़ कहा कि पेट्रोल और डीज़ल की खुदरा कीमतों पर सब्सिडी देने के लिए हमें सिंचाई योजनाओं, फ्री एलपीजी देने वाली उज्ज्वला योजना, ग्रामीण विद्युतीकरण, लोन के लिए मुद्रा योजना जैसी कई योजनाओं को बंद करना पड़ेगा. गडकरी ने आगे कहा की हम 10 करोड़ परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना पर काम कर रहे हैं. फसल बीमा योजना पर काम चल रहा है. हमारे पास साधन सीमित हैं.अगर आइसे में हमने पेट्रोल-डीज़ल के दामों पर सब्सिडी देनी पड़ी तो सब गड़बड़ हो जाएगा.

वहीं जब नितिन गडकरी से सवाल किया गया कि पेट्रोलियम उत्पादों में टैक्स कटौती करके भी जनता को राहत दी जा सकती है तो उन्होंने कहा कि ये हमारी अर्थव्यवस्था की नीव है. अगर इस बारे में फैसला लिया जाता है तो ये हमारे वित्त मंत्री तय करेंगे. वैकल्पिक इंधन के इस्तेमाल के सवाल पर गड़करी ने कहा कि सरकार मेथनॉल, इथेनॉल, बायो-डीज़ल, इ-वाहन जैसी योजनाओं पर तेज़ी से काम कर रही है. साथ ही ये सारे विकल्प सस्ते और प्रदूषण-मुक्त भी हैं.

देश में बढती तेल कीमतों पर बोलते हुए गड़करी ने कहा कि हम अपनी जरुरत का केवल 30 फीसदी ही खनन कर पाते हैं जबकि बाकी का 70 फीसदी हमें आयात करना पड़ता है. इसलिए हम आयात कीमतों को कम करने में लगे हुए हैं. हम दुनिया में कई जगह तेल क्षेत्रों के अधिग्रहण योजना पर भी काम कर रहे हैं. जैसा हमने अभी रूस के साथ किया है. लेकिन स्वाभाविक बात है कि 70 फीसदी आयात की जाने वाली वस्तु की पूर्ति करने के लिए पैसे नहीं हैं.

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