अक्टूबर में राहुल गाँधी को कांग्रेस की कमान, पार्टी संगठन में होंगे कई बदलाव!

13 Sep 2017
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आवाज़(मूकेश शर्मा,दिल्ली): राहुल गाँधी अब कुछ बदले बदले नज़र आ रहे हैं. खुलकर बोल रहे हैं फिर चाहे वो अपनी ही पार्टी के खिलाफ क्यों ना  हो. या यों कहें कि राहुल अब कांग्रेस को अपने हिसाब से चलाने जा रहे हैं. विश्वस्त सूत्रों से पता  चला है कि अब अक्टूबर में राहुल गाँधी को कांग्रेस की कमान दी जा रही है. यानी अब कांग्रेस के युवराज कांग्रेस के सर्वेसर्वा होने जा रहे हैं. और ये सब एकदम अचानक से नही हुआ बल्कि इसके लिए काफी समय से तैयारी की जा रही थी. आज देश के हालात ऐसे हैं जिनमे टीम राहुल को लगता है अब राहुल गाँधी का खुले तौर पर सामने आना जरुरी है.अमेरिका में दिए गये सवालों के जवाब भी इस और इशारा कर रहे हैं की उनकी राजनीती भविष्य में किस और जाने वाली है. वहां राहुल ने साफ़ तौर पर ये इशारा दे दिया है कि वो ना केवल अध्यक्ष पद के लिए बल्कि प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए भी तैयार हैं..

सूत्रों की मानें तो अक्टूबर में संगठन चुनावों के बाद राहुल सोनिया गाँधी की जगह ले लेंगे. संगठन में भी उन्हीं के द्वारा सुझाये गये लोगों को तरजीह डी जाएगी, यानी टीम राहुल में कुछ अनुभवी लोगों के साथ युवाओं को तरजीह दी जायेगी. साथ ही राहुल गाँधी आधिकारिक तौर पर कमान संभालने से पहले अपनी छवि को भी बदलना चाह रहे हैं. वो नेहरु गाँधी परिवार की विरासत को संभालना चाहते हैं लेकिन उसे ढोने का जो इलज़ाम उनपर हमेशा लगता आया है वो उसे से भी छुटकारा चाह रहे हैं. शायद इसिलए वो अमेरिका में अपने दुःख का इज़हार करते हुए अपने आप को दंगा पीड़ितों के साथ खड़ा हुआ दिखने की कोशिश करते हैं और साथ ही ये भी कहते हैं की हिंसा का सबसे बड़ा शिकार वो खुद हुए हैं. उनसे ज्यादा इस दर्द को और कौन समझ सकता है. दंगों को गलत और अमानवीय करार देना और दंगा पीड़ितों के साथ खड़ा होने की बात कहकर वो अतीत के उन इल्जामों से भी मुक्ति चाह रहे हैं जो उनकी पार्टी पर हमेशा लगते आ रहे हैं.

साथ ही अपनी ही पार्टी की आलोचना करना और ये कहना की 2012 तक कांग्रेस अहंकार से भर गई थी और जनसंवाद ना के बराबर हो गया था ये दर्शाता है की राहुल जनता की नब्ज पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि सभी जानते हैं की 2012 के बाद यू.पी.ए. सरकार सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार और नित नए घोटालों के लिए जानी जाती थी. शायद यही वजह रही की पार्टी 2014 के चुनावों में 44 सीटों तक सिमट के रह गई. 

प्रधानममंत्री पद की उम्मीदवारी से पहले निर्विवाद नेता बनने की कवायद 

राहुल गाँधी अबकी बार पार्टी के साथ साथ देश की राजनीति में निर्विवाद विपक्ष के नेता बनने में कोई कसर नही छोड़ना चाहते. जानकारों की मानें तो राहुल गाँधी की पहली कोशिश सोनिया गाँधी के बजाये खुद को विपक्ष के नेता स्थापित करने करने की है. जो सर्वमान्य हो, निर्विवाद हो और सबको साथ लेकर चल सके. राहुल गाँधी ये जानते है कि कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जो विपक्ष को एकछत्र तले ला सकती है. और बाकी दलों को भी उनकी लीडरशिप में काम करने में कोई दिक्कत नहीं होगी.

नीतीश के रहते जो असमंजस था अब वो नही

सूत्रों की मानें तो जब तक नीतीश कुमार यू.पी.ए. के साथ थे तब तक राहुल ऐसी पहल करने में हिचक रहे थे. इतना ही नही वो एक समय आगामी लोकसभा चुनावों में नीतीश की अगुवाई में लड़ने के लिए भी तैयार हो गये थे.लेकिन अब हालात बदल गये हैं. बदले वक़्त ने राहुल गाँधी को ऐसा अवसर दिया है जिस में वो अपने अनुकूल सारी चीजों को व्यवस्थित कर सकते हैं. क्योंकि देश के सारे क्षेत्रीय दलों की कमान भी युवाओं के हाथ में है और उन सब को राहुल गाँधी के साथ चलने में कोई एतराज़ भी नही है. आइये सिलसिलेवार तरीके से इन राज्यों पर एक नज़र डालते हैं.

उत्तर प्रदेश

यहां की समाजवादी पार्टी अब मुलायम की नही बल्कि अखिलेश वाली समाजवादी पार्टी है,जिसकी राहुल गाँधी से करीबियां किसी से छुपी हुई नही हैं. पिछला विधानसभा चुनाव इसका उदहारण है. दोनों ने जिस तरह से साथ प्रचार किया और एक दूसरे के साथ खड़े हुए वो भी किसी से छुपा हुआ नही है. साथ ही अखिलेश भी ये कह चुके हैं की उन्हें केंद्र की राजनीती में कोई दिलचस्पी नही है. वो यू.पी. में ही खुश हैं. ऐसे में माहौल राहुल के अनुकूल है. रही बात मायावती की तो लालू उनको और अखिलेश को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटे हुए हैं और राहुल ये भली भांति जानते हैं मायावती के पास भी और कोई बेहतर  विकल्प नही है. गाहे बगाहे वो भी एक दिन राहुल की लीडरशिप में आ जायेंगी.

बिहार 

बिहार में नीतीश का यू.पी.ए. का साथ छोड़ने के बाद अब हालात पूरी तरह बदल गये हैं. लालू यादव भी अपनी विरासत अपने बच्चों को सौंपने जा रहे हैं. यानी उनकी राजनीती अब केवल उनके बच्चों के लिए है.और राहुल को भी उनसे कोई दिक्कत नही होगी. मोदी विरोध के नाम पर इस कुनबे को आसानी से उनकी लीडरशिप के लिए तैयार किया जा सकता है..

झाड़खंड

हालात झाड़खंड में भी कुछ ऐसे ही प्रतीत हो रहे हैं. यहां भी झाड़खंड मुक्ति मोर्चा की कमान अब शिबु शोरेन के बाद हेमंत शोरेन के हाथ में है. हेमंत शोरेन को भी केंद्र में राहुल की सरपरस्ती से कोई दिक्कत नही है. वहीँ राहुल को भी झाड़खंड में कांग्रेस को इनका छोटा भाई बनाने में कोई एतराज़ नही है. और रही बात झाड़खंड विकास मोर्चा के बाबूलाल मरांडी की तो उनके पास भी कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नही है. थोड़ी सी कोशिश के बाद यहाँ विपक्ष राहुल गाँधी के साथ आ जायेगा.

पश्चिम बंगाल 

हाल के दिनों की बात करें तो राहुल गाँधी और सी .पी.एम. नेता सीताराम येचुरी की नजदीकियां काफी बढीं हैं. मोदी विरोध ने दोनों को एक दूसरे के करीब ला खड़ा किया है.हालंकि यहाँ कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी समस्या सी.पी.एम. के साथ त्रिद्मूल कांग्रेस को कैसे मनाया जाए होगी. लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए इसपर कुछ भी कहना मुमकिन नही है. और वैसे भी राहुल जानते हैं कि पश्चिम बंगाल से उन्हें समर्थन मिल जाएगा क्योंकि अगर एक दल भी आता है तो वो अपना काम चला सकते हैं. इस हालात में जो सबसे ज्यादा ताक़तवर उन्हें दिखेगा कांग्रेस उसको तरजीह दे सकती है.

तमिलनाडु 

डी.एक.के. के नेता करूणानिधि की बढती उम्र और बिगडती सेहत के चलते अब पार्टी की कमान उनके बेटे स्टालिन के हाथों में है. सूत्रों की मानें तो स्टालिन और राहुल गाँधी की मुलाकात कई बार हो चुकी है और दोनों मौजूदा राजनितिक हालात पर काफी चर्चा कर चुके हैं. बंटवारा सीधा होगा की तमिलनाडु में कांग्रेस छोटा भई और केंद्र में डी.एम.के.

आंध्र प्रदेश

बंटवारे के बाद यहाँ कांग्रेस हाशिये पर है. लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकार ये कोशिश कर रहे हैं की किसी तरह जगन मोहन रेड्डी या तो कांग्रेस में आ जाएँ या फिर उनके साथ गठबंधन कर लें. कांग्रेस को पूरी उम्मीद है की बात बन सकती है क्योंकि उनके पास भी कोई बहुत ज्यादा विकल्प नही हैं. बात फिर से वही होगी कि केंद्र में कांग्रेस बड़ा भाई और आंध्र में कांग्रेस छोटा भाई.

महाराष्ट्र 

महाराष्ट्र की राजनीति आजकल कुछ बदली बदली नज़र आ रही है.पहले एन.सी.पी. के बीजेपी के साथ जाने की खबर आई. लेकिन  अब सबकुछ ठीक है.शरद पवार की  बढती उम्र अब इस बात को गवारा नही करती की वो उतने केंद्र की राजनीति में सक्रिय रह सकें. ऐसे में अब पार्टी की कमान या तो उनकी बेटी सुप्रिया  शूले के पाद या  फिर भतीजे अजीत पवार के पास जायेगी. ऐसे में चाहे फिर सुप्रिया हों या अजीत दोनों को राहुल गाँधी के साथ मिलकर काम करने में कोई दिक्कत नही होगी. और रही बार शरद पवार की तो उनके सोनिया गाँधी से आज भी मधुर संबंध हैं और दोनों बैठकर इस मुद्दे पर कभी भी चर्चा कर सकते हैं.

कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि आज देश के जो हालात हैं वो राहुल गाँधी के बिलकुल अनुकूल हैं.मौजूदा दौर में विपक्ष में पूरी तरह बिखराव है. और एक ऐसे नेता की जरुरत सबको है जो सर्वमान्य हो. हालांकि टीम राहुल के लिए सबको इक्कट्ठा करना भी एक बड़ी चुनौती होगी. लेकिन ये कहा जा सकता है टीम राहुल अब पूरी तरह से ज़मीन पर उतरने के लिए तैयार है और मोदी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए भी. अब परिणाम क्या होगा ये तो वक़्त ही बतायेगा लेकिन जिस तरह से राहुल ने अब कमर कसी है वो इस बात की और साफ़ इशारा है कि  मोदी सरकार के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष देते हुए आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए टीम मोदी को टीम राहुल कड़ी चुनौती पेश करने के मूड में हैं..  

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