भाजपा के प्रति मुस्लिम महिलाओं का बढ़ता झुकाव, ट्रिपल तलाक पर याचिका लगाने वाली इशरत जहां भाजपा में हुई शामिल

01 Jan 2018
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आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): मोदी सरकार के ट्रिपल तलाक पर क़ानून बनने के कदम से देश भर में मुस्लिम महिलायों के एक तबके का झुकाव बीजेपी के प्रति बढ़ा है. इसका उदहारण हमें तब देखने को मिला जब सुप्रीम कोर्ट तक तीन तलाक की लड़ाई ले जाने वाली पांच याचिकाकर्ताओं में से एक इशरत जहां शनिवार (30 दिसंबर) को पश्चिम बंगाल बीजेपी में शामिल हो गईं. मतलब साफ़ है कि जो मोदी सरकार के इस कदम ने मुस्लिन महिलाओं को अपनी पार्टी की तरफ आकर्षित किया है, जो निश्चित तौर पर दूसरी पार्टियों के लिए चिंता का सबब है क्योंकि आज तक बीजेपी को हिन्दू कट्टरवाद की पार्टी माना जाता रहा है. बार-बार बीजेपी को मुस्लिम विरोधी पार्टी के तौर पर दिखाया जाता रहा है. जब मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब एक तबके ने ये फ़ैलाने की कोशिश की थी कि अब इस देश में ,मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार सबका साथ, सबका विकास की बात की, लेकिन विरोधी पार्टियों ने उनपर मुस्लिम विरोधी होने के इल्ज़ाम लगाये. अब ट्रिपल तलाक के ऊपर कानून बनाकर नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम महिलाओं के एक तबके को अपने साथ जोड़ने का काम किया है जिसका असर दिख रहा है. इशरत जहां ने जहां ट्रिपल तलाक पर क़ानून बनाने के लिए मोदी का धन्यवाद् किया वहीँ बीजेपी पर शामिल होने पर उन्होंने कहा कि इस पार्टी में शामिल होकर उन्हें अच्छा लग रहा है. बताया जा रहा है कि लोकसभा में तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिला (विवाह संरक्षण अधिनियम)-2017 विधेयक के पास होने के बाद इशरत ने भगवा पार्टी में शामिल होने का फैसला किया.

इस मौके पर पश्चिम बंगाल महिला मोर्चा की अध्यक्ष लॉकेट चटर्जी ने इशरत जहां को मिठाई खिलाकर पार्टी में शामिल होने का स्वागत किया. इससे पहले इशरत ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की. चटर्जी ने कहा कि इशरत जहां आर्थिक तंगी से गुजर रही हैं।.इसलिए वह केंद्र सरकार से गुजारिश करेंगी कि उन्हें नौकरी दी जाय. चटर्जी ने आरोप लगाया कि राज्य की ममता बनर्जी सरकार ने उन्हें कोई मदद नहीं दी.

दरअसल तीन तलाक देने को अपराध के दायरे में लाने वाला कानून लोकसभा से पास हो गया है. इससे पहले गुरुवार (28 दिसंबर) को लोकसभा में इस बिल में कुछ संशोधनों को लेकर वोटिंग हुई थी. एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने भी वोटिंग की मांग की थी लेकिन सदस्यों ने उनके संशोधनों को पूरी तरह से खारिज कर दिया. एक संशोधन पर हुई वोटिंग में तो ओवैसी के पक्ष में सिर्फ 2 वोट पड़े. जबकि, इसके खिलाफ 241 वोट पड़े. दूसरे प्रस्ताव में भी उनके पक्ष में सिर्फ 2 वोट पड़े. वहीं, 242 लोगों ने उनके प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया. हालांकि, इससे पहले उनके संशोधन के प्रस्ताव को लोकसभा के सदस्यों ने ध्वनि मत से खारिज कर दिया था. सदन में इससे पहले इस बिल पर विस्तृत चर्चा हुई.(इनपुट:जनसत्ता)

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