आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और कभी कांग्रेस के युवा और जुझारू नेता रहे अरविंदर सिंह लवली ने घर वापसी करते हुए कांग्रेस का हाथ थाम लिया है. तक़रीबन 9 महीने पहले कांग्रेस का साथ छोड़ते हुए लवली ने बीजेपी ज्वॉइन की थी. अब उनकी फिर से घर वापसी हो गयी है और पुराने सारे गिले शिकवे भी दूर हो गये हैं. पर ये सब अचानक नहीं हो रहा है. दरअसल इसके पीछे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की रणनीति है जो अब अपना असर दिखाने लगी है. राहुल गाँधी जब से कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं तब से ये माना जा रहा है कि अब कांग्रेस में भारी फेरबदल देखने को मिलेगा लेकिन अबतक ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला. यानी राहुल का गेम प्लान कुछ और ही है. राजनीतिक पंडितों की मानें तो राहुल एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं. वो पुरानी भूलों से सबक लेते हुए आगे बढ़ रहे हैं और अब कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते जिससे पार्टी में और बिखराव हो.

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक राहुल की सबसे बड़ी प्राथमिकता पार्टी के अंदर की गुटबाजी को ख़त्म करना है. साथ ही जो लोग कांग्रेस के अंदर पार्टी से भी बड़े हो गये थे और जिनके कारण पार्टी को हर तरफ हार झेलनी पड़ी, उन्हें दरकिनार कर एक ऐसी कांग्रेस खड़ी करना है जहाँ सबको बराबर नजर से देखा जाए और सभी मिलकर कांग्रेस के लिए काम करें. सूत्रों की मानें तो राहुल ने पूरे देश का दौरा किया है और जहाँ-जहाँ भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है वहां सबसे राय मशवरा किया है. वहां से जो फीडबेक आई उसके मुताबिक कांग्रेस अपनी गुटबाजी की वजह से हारी है. यानी कांग्रेस ने ही कांग्रेस को हराने में सबसे बड़ा रोल अदा किया. ऐसे में राहुल गांधी अब कांग्रेस में कोई भी ऐसा बड़ा नेता पैदा नहीं होने देना चाहते जो कल कांग्रेस के लिए दिक्कत पैदा करे. यानी सबके लिए कांग्रेस सर्वप्रथम होगी और कोई ऐसा नाम नहीं होगा जो अपने आप को कांग्रेस से भी बड़ा समझे और कल को कांग्रेस के लिए दिक्कत पैदा करे.

सूत्रों की मानें तो अब राहुल ने एक ऐसी रणनीति तैयार की है जिसके तहत जो लोग कई वजहों से कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में चले गये थे और घर वापसी चाहते हैं उन्हें फिर से कांग्रेस के साथ जोड़ा जाए. इसकी शुरुआत दिल्ली से हुई है. यहां उन्होंने दिल्ली कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अजय माकन को गुटबाजी ख़त्म करके सबको एक होकर काम करने की सलाह दी. जिसके बाद अजय माकन और शीला दीक्षित के बीच समझौता हुआ और अब कभी दिल्ली कांग्रेस के दिग्गज रहे अरविंदर सिंह लवली की घर वापसी संभव हुई. राहुल ये बात भली-भाँती जानते हैं कि अगर कांग्रेस से बिछड़े हुए लोग घर वापिस आ जाते हैं तो कांग्रेस फिर से मजबूत होगी और पूरे देश में एक सकारात्मक सन्देश जाएगा. साथ ही राहुल को लगता है कि जो भी नेता कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में गये थे उन्हें ये उम्मीद थी कि बीजेपी में उन्हें कोई बड़ा पद और मान-सम्मान मिलेगा. लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हुई और उन्हें बीजेपी ने अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करके दरकिनार कर दिया. ऐसे में उन लोगों को अब अपनी गलती का एहसास हो गया है, और अगर वो घर वापसी करना चाहते हैं तो कांग्रेस को इसमें कोई दिक्कत नहीं है. इस एक कदम से कांग्रेस को मजबूती ही मिलेगी ,साथ ही 2019 की लड़ाई भी आसान होगी.

सूत्रों की मानें तो अरविंदर सिंह लवली की वापसी तो महज़ एक शुरुआत है और आने वाले वक़्त में बहुत सारे दिग्गज नेताओं की कांग्रेस में घर वापसी हो सकती है. जिसकी शुरुआत दिल्ली से हुई है और पूरे देश तक जायेगी. अंदेशा है कि कई बड़े नाम वापिस कांग्रेस में आ सकते हैं जो किन्ही मुद्दों को लेकर नाराज़ होकर कांग्रेस से चले गये थे. इसके लिए वो लगातार कांग्रेस के संपर्क में हैं, और जल्द ही ऐसा कुछ देखने को मिल सकता है जो राष्ट्रिय राजनीति में खलबली पैदा करे. यानी राहुल गांधी की नज़र और प्राथमिकता उन बड़े जनाधार वाले बड़े नेताओं की घर वापसी है जो कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में चले गये थे और अब वहां असहज महसूस कर रहे हैं. 

बहरहाल इतना तय है कि राहुल गांधी एक सधे और मंझे हुए राजनितिक खिलाड़ी की तरह अपनी चाल चल रहे हैं और हर वो संभव कोशिश कर रहे हैं जिससे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरे. क्योकि राहुल को ऐसा लगता है कि पूरे विपक्ष को एक साथ लेकर चले तो न केवल बीजेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है अपितु सत्ता में भी उनकी वापसी हो सकती है. अब वो इस रणनीति में कितने कामयाब हो पते हैं ये तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा लेकिन लवली की घर वापसी से इतना तो तय हो ही गया है की अब इस फेहरिस्त में और भी कई बड़े नाम हो सकते हैं जो कांग्रेस में घर वापसी करें. अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी........

 

 

 

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): अभी जींद में बीजेपी की युवा हुंकार रैली की चर्चा ख़त्म भी नही हुई थी कि बीजेपी को उन्हीं की पार्टी के सांसद राज कुमार सैनी ने जोर का झटका धीरे से दे दिया. उन्होंने बीजेपी से बगावत करते हुए अपनी अलग पार्टी बनाने का ऐलान किया है. कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद राजकुमार सैनी ने शुक्रवार को ऐलान किया कि वह आगामी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाएंगे. सैनी ने कहा कि पार्टी बनाने का ये काम अगले चार महीनों के भीतर हो जाएगा. इसके साथ ही बीजेपी सांसद ने ये भी कहा कि वो 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा की सभी 10 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेंगे.

गौरतलब है कि राजकुमार सैनी कुरुक्षेत्र से बीजेपी के सांसद हैं और जाट आरक्षण के खिलाफ पिछले काफी समय से मुहीम छेड़े हुए हैं. दरअसल उनका ये ऐलान बीजेपी के लिए कई मुसीबतें पैदा कर सकता है क्योंकि अभी हरियाणा में गुरुवार को ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की बाइक रैली हुई है. प्रमुख विपक्षी दल आईएनएलडी के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक जींद में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ रैली में एक लाख बाइक सवार ने हिस्सा लिया था. बीजेपी इस रैली के बाद काफी खुश थी और उन्हें लग रहा था कि इस बार हरियाणा में सभी 10 सीटों पर भगवा परचम लहरायेंगे. जाटलैंड के नाम से मशहूर जींद में अमित शाह ने रैली के बाद अपने कार्यकर्ताओं से आह्वाहन किया कि हरियाणा की, सभी लोकसभा सीटों पर भगवा रंग चढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़नी है. हमें 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 10 सीटों पर बीजेपी का परचम लहराना है. लेकिन जींद से अमित शाह की इस हुंकार के अगले दिन ही पार्टी के एक सासंद ने बगावत कर ऐसा ऐलान कर दिया जिससे पार्टी के अंदर खलबली मचना तय माना जा रहा है. सैनी द्वारा अलग पार्टी बनाने के ऐलान के बारे में जब बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष सुरेश बराला से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस बारे में केंद्रीय नेतृत्व को सारी जानकारी दे दी गई है. 

गौरतलब है कि इससे पहले गुरुवार को जींद में आयोजित भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह की रैली में भी राजकुमार सैनी नहीं पहुंचे थे. उन्होंने इस रैली से पूरी तरह से किनारा कर लिया था. इतना ही नहीं रैली के तुरंत बाद उन्होंने रैली को असफल करार देते हुए मीडिया से कहा कि यह युवा हुंकार रैली सिद्धांतों को ताक पर रखकर आयोजित की गई. इसी कारण उन्‍होंने रैली से दूर रहना ही उचित समझा. उन्होंने बगावती सुर अलापते हुए कहा कि भाजपा उनको रखे चाहे पार्टी से निकाले इसकी अब परवाह नहीं है.

दरअसल सांसद सैनी पिछले काफी समय से विद्रोही तेवर अपनाए हुए हैं. वो कई मुद्दों को लेकर अपनी ही राज्य सरकार पर हमले भी करते रहे हैं. साथ ही उनका केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह से भी टकराव होता रहा है. अगर इस मुद्दे को गौर से देखा जाए तो राज कुमार सैनी लोकसभा चुनाव से पहले हरियाणा में असली लड़ाई जाट बनाम गैर जाट बनाना चाहते हैं, और खुद  को सबसे बड़े गैर-जाट नेता. इसी कारण से वो जात आरक्षण के खिलाफ भी पिछले काफी समय से मोर्चा खोले हुए हैं. अब वो इसमें कितने कामयाब हो पाते हैं और सूबे में बीजेपी की मुश्किलें कितनी बढाते हैं ये तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा, लेकिन इतना तो तय है कि बीजेपी जितना आसान इस लड़ाई को समझ रही थी उतनी है नहीं, क्योंकि एक त्तारफ तो लोहा विपक्ष से लेना है और दूसरी तरफ अपनी पार्टी के इन बगावती सुरों पर भी लगाम लगानी है.

आवाज़(मुकेश शर्मा, गुरुग्राम): आख़िरकार बीजेपी ने हरियाणा के जींद में हुंकार रैली कर मिशन 2019 का आगाज़ कर दिया. जाट लैंड में आयोजित इस रैली को विपक्ष जहाँ फ्लॉप शो करार दे रहा है वहीँ मुख्यमंत्री खट्टर और उनके सहयोगी सफल रैली के आयोजन का दावा कर अपनी पीठ थपथपाने से नहीं चूक रहे. अब किसके दावे में कितना दम है आम जनता इसे लेकर भी थोड़ी उहापोह की स्थिति में है. जहां खट्टर एंड पार्टी लाख से सवा लाख बाइक आने का दावा कर रहे हैं वहीँ विपक्ष इसे फ्लॉप करार देकर आयोजन स्थल में ख़ाली पड़ी कुर्सियों के विडियो सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर शेयर करके सरकार का मज़ाक उड़ा रहा है. खैर इतना तो स्पष्ट है कि रैली में उतनी भीड़ नहीं आई जितनी उम्मीद थी. इसकी पुष्टि शाम ABP न्यूज़ की खबर से भी हुई जहाँ पर उन्होंने आयोजन स्थल पर खाली पड़ी कुर्सियों को दिखाया और साथ ही ये भी दिखाया कि किस तरह अमित शाह ने बोलना ही शुरू किया था और लोग उठकर चलना शुरू हो गये. ये निश्चित तौर पर किसी भी पार्टी के लिए सोचने का वक़्त होता है जब किसी पार्टी में मुख्य वक्ता यानी मुख्यातिथि बोलना शुरू करें और लोग उन्हें जिज्ञासा से सुनने के बजाये अपनी सीट से उठकर चलना शुरू कर दें. मतलब साफ़ है कि अगर बीजेपी जैसी पार्टी के बारे में बात करें तो ये उनके लिए निश्चित तौर पर खतरे की घंटी है. तो क्या ये माना जाए कि हरियाणा में बीजेपी का जादू फीका पड़ गया है. या फिर ये रैली वाकई में शानदार थी, जिसे विपक्ष और मीडिया फ्लॉप करार देकर जानबूझकर जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं. आइये हम आपको सिलसिलेवार तरीके से इस रैली के बीजेपी के लिए मायने बताते हैं और ये भी जानने का प्रयत्न करते हैं कि क्या वाकई में रैली कामयाब थी या फिर फ्लॉप शो, आखिर इस रैली के बाद बीजेपी के लिए क्या नये समीकरण उभर कर सामने आये और किन-किन बातों पर बीजेपी को आने वाले समय में ध्यान देना होगा.........यानी बीजेपी के लिए खतरे की घंटी........

 

जाट लैंड में जनाधार बढ़ाने का प्रयत्न और उसमे थोड़ी कामयाबी.....

अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है वो जब भी कुछ तय करते हैं तो इसके पीछे उनकी एक सधी हुई रणनीति होती है. इसी तरह जब ये रैली जींद में करने का फैसला किया गया था तभी से मतलब साफ़ था कि अमित शाह ने जानबूझकर जींद को चुना है. वजह भी साफ़ थी, सियासी समीकरणों पर नजर डाली जाए तो जींद मुख्य तौर पर जाट लैंड है. बात चाहे विधानसभा चुनाव की हो या फिर लोकसभा की. बीजेपी यहाँ से फिस्सड्डी ही साबित हुई है. अमित शाह साफ़ तौर पर पार्टी को यहाँ मजबूत करना चाहते हैं. इसीलिए अमित शाह ने जानबूझकर यहाँ रैली करने का निर्णय लिया. साथ ही वो ये भी जानना चाहते थे कि जाट लैंड में बीजेपी से कितने लोग खुश हैं यानी उनकी नजर यहाँ आने वाली भीड़ पर भी थी. वा हरियाणा सरकार में बीजेपी ने जाट मंत्रियों को भी जगह दी है. जिसमे कैप्टेन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनखड़ जैसे कद्दावर नेता हैं साथ ही बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष भी जाट समुदाय से ही आते हैं. शायद बीजेपी के राष्ट्रिय अध्यक्ष ये देखना चाहते थे कि इन नेताओं ने पिछले जनाधार के मुकाबले कुछ वृद्धि भी की है या फिर अबतक वो जाटों को रिझाने में नाकामयाब ही रहे हैं. अब इसमें अमित शाह को कुछ तो हासिल हुआ,उन्हें ये साफ़ दिखा कि बीजेपी ने कुछ भीड़ तो जुटाई लेकिन खाली पड़ी कुर्सियों से ये साफ़ हो गया कि यहाँ डगर अभी बहुत कठिन है. यानी बीजेपी को मिशन 2019 के तहत यहाँ कुछ विशेष रणनीति बनाने की आवश्यकता है.

चौधरी वीरेंद्र सिंह बीजेपी के सबसे बड़े जाट नेता बनकर उभरे.....

अमित शाह आगामी लोकसभा चुनावों के लिए एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं. इस रैली में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि ये निकली कि अमित शाह को ये मालूम पड़ गया कि अगर जाटों को 2019 में बीजेपी के पक्ष में लाना है तो चौधरी वीरेंद्र सिंह उनके लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं. जाट आन्दोलन से जुड़े नेता भी उनकी बात मानते हैं और उन्हें हर जगह अपने कार्यक्रमों में भी आमंत्रित करते हैं. यानी बीजेपी को यहाँ से आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए एक ऐसा चेहरा मिल गया जिसकी अमित शाह को तलाश थी. यानी ये बिलकुल साफ़ हो गया कि बीजेपी के पास हरियाणा में अगर कोई सबसे बड़ा जाट चेहरा है तो तो वो केवल चौधरी वीरेंद्र सिंह ही हैं. रणनीति बिलकुल साफ़ है अगर INLD के इस गढ़ पर फतह हासिल करनी है तो वीरेंदर सिंह के ऊपर दांव आजमाया जा सकता है. जानकारों की मानें तो बीजेपी तो ऐसा लगता है कि केन्द्रीय मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह ऐसे एकमात्र नेता हैं जिनकी छवि साफ़ और इमानदार नेता की है और अगर बीजेपी को मिशन 2019 फतह करना है तो इनपर ही दांव खेला जा सकता है. यानी रणनीति साफ़ है कि यहाँ से 2019 में INLD के दुष्यंत चौटाला के खिलाफ चौधरी वीरेंद्र सिंह बीजेपी के उम्मीदवार हो सकते हैं. 

केंद्र की नीतियों का प्रचार-प्रसार..........

अमित शाह को ये भली-भाँती पता है कि लोकसभा चुनाव अगले साल हैं. तो वो अभी से इसकी तैयारी शुरू कर रहे हैं वो ये पता करना चाहते हैं कि कहाँ वो कमज़ोर हैं और कहां मजबूत. इसके साथ ही वो केंद्र की कल्याणकारी नीतियों का प्रचार-प्रसार भी करना चाहते हैं क्योंकि वो ये बात अच्छी तरह से जानते हैं की केंद्र की नीतियों को जब तक घर-घर तक नहीं पहुँचाया जाएगा तबतक लोगों को ये पता नहीं चलेगा कि आखिर मोदी सरकार ने उनके लिए किया क्या है. ऐसे में अगर इस जाट लैंड क्षेत्र की बात करें तो यहाँ का ज्यादातर इलाका ग्रामीण है. वहां के लोगों तक सरकार की नीतियों का न तो प्रचार-प्रसार हो पाता है और न ही उनतक उनका लाभ पहुँच पाटा है. प्रधानमंत्री मोदी भी अक्सर अपने सांसदों को बार-बार बुलाकर केंद्र की कल्याणकारी नीतियों को जनता तक पहुँचाने की बात करते हैं लेकिन सांसद इसमें अबतक फेल ही नजर आये हैं. ऐसे में अमित शाह रैली के माध्यम से भी सरकार की इन नीतियों को जनता तक पहुँचाना चाह रहे हैं. अपने भाषण में भी उन्होंने इसका जिक्र किया और केंद्र की आयुष्मान स्कीम को उन्होंने मोदी केयर करके पुकारा. उन्हें ये पता है कि ये स्कीम जनता तक अगर सही मायनों में पहुँच गयी तो 2019 में गेम चेंजर साबित हो सकती है. ऐसे में शहरी क्षत्रों के लोगों को तो फिर भी थोडा बहुत पता रहता है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को इन नीतियों का ज्ञान नहीं हो पाता है. इसी के मद्देनजर अमित शाह ने इस ग्रामीण बहुल्य क्षेत्र को चुना और केंद्र की नीतियों का प्रसार किया.

मुख्यमंत्री की हुई अग्निपरीक्षा, खट्टर के काम की हुई समीक्षा.......

मनोहर लाल खट्टर एक इमानदार नेता हैं जिनकी इमानदारी पर विपक्ष को भी शक नहीं है. लेकिन क्या सिर्फ इमानदार होना ही एक मुख्यमंत्री के सफल होने की सबसे बड़ी निशानी है? जब से खट्टर मुख्यमंत्री बने हैं तबसे विवाद उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. उनके राज़ में 3 बार हरियाणा जला, और वो कुछ नहीं कर पाए. फिर चाहे वो रामपाल वाला मुद्दा हो, जाट आरक्षण के दौरान हुई हिंसा हो या फिर राम-रहीम का मामला. हरियाणा हर बार जला और खट्टर पर ये आरोप लगा कि उन्होंने कुछ नहीं किया. इसके अलावा उनकी ही पार्टी के कुछ  विधायक उनके विरोध में उतर आये और सरेआम उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस करके अपना विरोध जता दिया. कई बार उन्हें हटाने की मांग उठी लेकिन पार्टी हाई-कमान के चहेते होने के कारण उन्हें हर बार उन्हें जीवन-दान मिला. यानी अमित शाह रैली के जरिये ये जानना चाहते थे कि मनोहर लाल खट्टर के नेत्रित्व में बीजेपी सरकार कैसा काम कर रही है. क्या लोग वाकई खुश हैं या फिर नेत्रित्व परिवर्तन ही एकमात्र विकल्प बचा है. अमित शाह को ये बात मालूम है कि अगर सूबे में बीजेपी की साख गिर रही है तो अभी इसे सँभालने का वक़्त है. ऐसे में ये रैली खट्टर के लिए भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं थी. अब वो कितने सफल हो पाए हैं ये तो अमित शाह ने खुद देख ही लिया होगा. लेकिन आयोजन स्थल में खाली पड़ी कुर्सियां जरुर खट्टर की चिंता बढ़ा रही होंगी.

अपनों का विरोध करेगा उत्पन्न अवरोध....

दरअसल हरियाणा में अमित शाह के लिए लड़ाई दोहरी है. एक तरफ तो कांग्रेस से लोहा लेना है वहीँ दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी के अंदर से उठने वाले विरोध के स्वरों को भी खामोश करना है. ऐसे में अगर हरियाणा की अगर बात करें तो यहाँ भी मुसीबतें कम नहीं हैं. कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद राजकुमार सैनी अपनी ही पार्टी के विरुद्ध झंडा उठाए हुए हैं. उनका विरोध साफ़ तौर पर जाटों के आरक्षण आन्दोलन के बाद से मुखर हुआ और अबतक जारी है. इतना ही नहीं उन्होंने अगला चुनाव भी बीजेपी से लड़ने के स्थान पर अपनी पार्टी बनाने तक का ऐलान कर दिया है. यानी राज कुमार सैनी अपने आप को गैर-जाट राजनीती का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनाना चाहते हैं. उन्होंने अमित शाह की रैली में भी न आने का ऐलान कर दिया और रैली के बाद उसके फ्लॉप होने के साथ-साथ गैर जाटों के साथ हो रहे अन्याय से जोड़ दिया. मतालब साफ़ है कि अगर बीजेपी को 2019 में हरियाणा का किला फतह करना है तो सबको साथ लेकर चलना होगा साथ ही अपनी ही पार्टी के अंदर के विरोध के स्वरों से कुछ इस तरह से निपटना होगा कि पार्टी को कोई नुक्सान भी न हो और जनता भी बीजेपी की तरफ आकर्षित हो सके.

बहरहाल चुनौतोयां कई हैं. युवा हुंकार रैली तो हो गई है और साथ ही छोड़ गई है कई सवाल, जिनका हल बीजेपी राष्ट्रिय अध्यक्ष को खोजना होगा. सूबे में बढती बेरोज़गारी की समस्या और किसानों की समस्याओं से भी किस तरह पार पाना है इसका हल ढूँढना भी उनकी प्राथमिकता होगी. यानी कहा जा सकता है कि हरियाणा से बीजेपी के मिशन 2019 की शुरुआत हो चुकी है. ये वक़्त अपनी भूलों से सबक लेने का है अभी एक साल बाकी है तो जनता की नजरों में कुछ ऐसा करके दिखाने का भी जिससे उन्हें लगे की ये वाकई उनके सपनों की सरकार है न की जुमलों की.

 

 

 

 

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): अमित शाह हरियाणा के जींद से आज मिशन 2019 की शुरुआत करने जा रहे हैं. रैली कुछ उसी अंदाज़ में होने जा रही है जिस तरीके से 2014 में मोदी ने हरियाणा के रेवाड़ी से अपने मिशन की शुरुआत की थी. यानी एक बार फिर से हरियाणा से ही मिशन 2019 की शुरुआत करना ये दर्शाता है कि हरियाणा बीजेपी के लिए शुभ है. खबर है कि लाखों कार्यकर्ता शामिल होने जा रहे हैं. कौने-कौने से बीजेपी कार्यकर्ता अपनी-अपनी बाइक लेकर जींद पहुँच रहे हैं. सरकार ने पूरा जोर लगा रखा है. मंत्री से लेकर संत्री तक रैली को कामयाब बनाने में जुटे हुए हैं. कोई अशुभ न हो इसके लिए सरकार ने रैली की सरक्षा के  पुख्ता इंतजाम भी कर लिए गये हैं. चप्पे-चप्पे पर केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों की टुकडियां तैनात कर रखी हैं. इसके अलावा स्थानीय पुलिस-प्रशासन अलग से जुटा हुआ है.

लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद भी मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही है. विपक्ष जिस तरीके से रैली के विरोध में उतरा हुआ है उससे सरकार काफी चिंतित है. कांग्रेस जहां शाह को काले झंडे दिखने पर उतारू है वहीँ INLD ने भी विरोध के स्वर पुख्ता किये हुए हैं. यानी रैली का विरोध कर सुर्खियाँ बटोरने की तैयारी विपक्ष ने पूरी तरह से कर रखी है. इतना ही नहीं विपक्ष तो इतने तक इलज़ाम लगा रहा है कि भाजपा को रैली के लिए कार्यकर्ता नहीं मिल रहे इसलिए वो 500 रूपए दिहाड़ी देकर किराये के कार्यकर्ता ला रहे हैं. इसके अलावा रैली में बाइक लेकर आने पर एक साल की सर्विसिंग फ्री देने तक के ऑफर लोगों को दिए जा रहे हैं ताकि भीड़ जुटाई जा सके. सोशल मीडिया पर इस तरह के कई विडियो विपक्ष के कई नेताओं ने शेयर किये हैं, जहां कोई रैली में आने वालों की रजिस्ट्रेशन करता हुआ दिख रहा है जो 500 रूपए प्रति व्यक्ति देने की बात कर रहा है, साथ ही ऐसे कई पोस्टर डाले गये हैं जिसमे रैली में बाइक लेकर आने पर एक साल की फ्री सर्विसिंग का वायदा किया जा रहा है. हालांकि आवाज़ न्यूज़ नेटवर्क इस तरह के किसी विडियो या पोस्टर की पुष्टि नहीं करता, ये जांच का विषय है जिसका पता जांच के बाद ही चल सकता है कि क्या वाकई ये सच है या फिर विपक्ष फिर जान-बूझकर इस तरह के हथकंडे अपना रहा है ताकि सरकार को बदनाम किया जा सके.

ये तो बात हो गई विपक्ष की जिसका विरोध करना एक हद तक जायज़ दिखता है. भई उनको भी राजनीती करनी है, तो सरकार का विरोध तो करना ही पड़ेगा. लेकिन अब घर के भीतर भी विरोध के स्वर उठ रहे हैं. कुरुक्षेत्र से बीजेपी सांसद राजकुमार सैनी कुछ मुद्दों के लेकर अपनी ही पार्टी से बेहद खफ़ा हैं. सुनने में आया है कि महोदय रैली में शिरकत भी नहीं करने जा रहे हैं. साथ ही अपना विरोध खुलकर जता रहे हैं. सरकार ने जिस तरह से रैली से ठीक पहले जिस तरह से जाटों के ऊपर से केस वापिस लिए हैं, उससे सबसे ज्यादा कोई दुखी है तो वो माननीय सांसद राजकुमार सैनी ही हैं. उन्हें लगता है कि हरियाणा में प्रजातंत्र का गला घोंटा जा रहा है. यानी लोकशाही रही ही नहीं है. जिसके पास डंडा है उसका ही राज चल रहा है. अब इस मुद्दे से अमित शाह कैसे निपटते हैं ये भी देखने वाली बात होगी. बहरहाल रैली को जिस तरह से लाइम-लाइट में लाया जाए इसका पूरा मसाला तैयार हो चूका है. अब ये रैली कितनी कामयाब होती है ये आज पता चल जाएगा लेकिन इतना साफ़ है कि कहानी में लाइट,कैमरा,एक्शन के साथ-साथ भरपूर ड्रामा भी रहना वाला है जिसका मजा हरियाणा के आमजन के साथ-साथ पूरा देश लेने वाला है.

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): आप अपने पैसे बैंक में सुरक्षित समझते हैं. सरकार भी आपको बैंकों में पैसा रखने और सारा लेनदेन करने की गुज़ारिश क्र रही है. लेकिन अब खबर ऐसी आई है जिससे ये सवाल पैदा हो रहे हैं कि आखिर बैंकों में रखा आपका पैसा पूरी तरह सुरक्षित है? दरअसल देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक पंजाब नेशनल बैंक की मुंबई स्थित एक शाखा में 11,360 करोड़ रुपये का फर्जी ट्रांजैक्शन किया गया है. फर्जीवाड़ा कर बैंक को चपत लगाई गई यह रकम शेयर बाजार में बैंक के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन का लगभग एक तिहाई है. इसके चलते जहां शेयर बाजार पर कंपनी के शेयरों को 10 फीसदी का नुकसान उठाना पड़ा वहीं एक अनुमान के मुताबिक बैंक के आम खाताधारक को भी बैंक में जमा उसके 100 रुपये में 30 रुपये का नुकसान झेलना पड़ेगा.

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज(NSE) के मुताबिक पंजाब नेशनल बैंक का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग 36,566 करोड़ रुपये है और उसने लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये का बाजार में कर्ज दे रखा है. बैंक में फर्जीवाड़े के खबर के बात बैंक के शेयर मूल्य में आई गिरावट से निवेशकों को एक दिन में लगभग 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा.

आखिर बैंक में कैसे हुआ इतना बड़ा फर्जीवाडा......

दरअसल पंजाब नेशनल बैंक ने 5 फरवरी को सीबीआई को लगभग 280 करोड़ रुपये के फर्जी ट्रांजैक्शन का मामला सुपुर्द किया था. इस मामले की जांच सीबीआई कर ही रही थी तो पता चला कि बैंक के मुंबई स्थिति महज एक ब्रांच से आई फर्जीवाड़े सूचना ने बैंक को 11,360 करोड़ रुपये के और अतिरिक्त नुकसान में ला दिया. हालांकि बैंक को अभी यह साफ करना बाकी है कि 5 फरवरी को सीबीआई को सूचित किया गया 280 करोड़ रुपये का फर्जीवाड़ा इस नए फर्जीवाड़े से अलग है अथवा दोनों मामले जुड़े हुए हैं.

सवाल ये की आखिर बैंक से साफ हुआ पैसा किसका ....

अब सवाल ये उठता है कि आखिर ये पैसा किसका है. इसके लिए हमें बैंक की कार्यप्रणाली पर एक नजर डालनी होगी. आमतौर पर किसी भी बैंक के पास दो सूत्रों से पैसे का आदान-प्रदान होता है. पहला रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और दूसरा बैंक के ग्राहक जो अपना पैसा ब्याज के लिए अपने खाते में जमा कराते हैं. हालांकि इसके अलावा कॉरपोरेट जगत से शेयर होल्डर का पैसा भी बैंक में जमा रहता है. मौजूदा मामला में बैंक ने फर्जी ट्रांजैक्शन का हवाला देते हुए 11,360 करोड़ रुपये की चपत की सूचना दी है लिहाजा यह साफ है कि यह पैसा शेयर होल्डर की तरफ से जमा कराया नहीं है. साथ ही न तो यह रुपया केन्द्रीय रिजर्व बैंक कि तरफ से कैश रिजर्व रेशियो को बनाए रखने के लिए बैंक को दी गई है. लिहाजा, एक बात साफ है कि फर्जी ट्रांजैक्शन से यदि किसी के पैसे को नुकसान पहुंचा है तो वह बैंक में जमा लाखों सामान्य खाता धारकों का पैसा है.

यहाँ एक बात और गौर करने लायक है कि यदि अपनी सूचना में बैंक किसी फर्जी ट्रांजैक्शन का हवाला दे रही है तो इसका साफ मतलब है बैंक के पास इस ट्रांजैक्शन की कोई सूचना उपलब्ध नहीं है लिहाजा वह यह जानने में सक्षम नहीं है कि बैंक से ट्रांजैक्शन के जरिए पैसा कहां पहुंच गया है. ऐसी सूचना के अभाव की स्थिति में इसकी भी संभावना बेहद कम हो जाती है कि बैंक इस फर्जी ट्रांजैक्शन में गंवाए पैसे को वापस पाने की स्थिति में है. लिहाजा एक सामान्य जोड़-घटाने से साफ है कि यदि बैंक को कुल मार्केट कैप में एक तिहाई का नुकसान हो चुका है तो इसकी भरपाई बैंक के ग्राहकों के पैसे से की जाएगी. ऐसी स्थिति में बैंक में यदि किसी ग्राहक का 100 रुपये जमा है तो उसके 30 रुपये इस फर्जीवाड़े में साफ हो सकते हैं.(सौजन्य:आजतक)

 

आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): कहते हैं वक़्त के साथ बहुत कुछ बदलता है और जो वक़्त के साथ नहीं बदलता उसको दुनिया बदल देती है, और होना भी ऐसा ही चाहिए, अगर हम वक़्त के साथ नहीं चलेंगे तो इस रंग बदलती दुनिया के साथ नहीं चल पाएंगे और पिछड़े हुए माने जायेंगे. ऐसा ही कुछ देखने को मिला है अब भारत के कट्टर हिन्दू संगठनों की सोच में, जो अब तक केवल अपनी कट्टरता के लिए जाने जाते थे. जी हाँ हम बात कर रहे हैं विश्‍व हिंदू परिषद की. ये बदलाव हमें तब देखने को मिला जब विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने वैलेंटाइन डे के समर्थन का ऐलान किया. उन्‍होंने कहा क‍ि अगर युवक और युवती प्रेम नहीं करेंगे तो सृष्टि नहीं चलेगी. विहिप नेता ने स्‍पष्‍ट तौर पर कहा कि युवाओं को प्रेम करने का अधिकार है और वैलेंटाइन डे पर किसी तरह का विरोध या हिंसा नहीं होगी.

गौरतलब है कि विहिप नेता और कार्यकर्ता वर्षों से प्रेम के प्रतीक वैलेंटाइन डे का विरोध करते रहे हैं. संगठन इसके खिलाफ फरमान जारी कर लोगों को आगाह भी करता रहा है. ऐसे में वैलेंटाइन डे से ठीक पहले विहिप नेता का यह रुख चौंकाने वाला है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रवीण तोगड़िया 11 फरवरी को चंडीगढ़ में विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘प्रेम नहीं करेंगे तो विवाह नहीं होगा, विवाह नहीं होगा तो सृष्टि कैसे चलेगी? युवा और युवतियों को प्रेम करने का पूरा अधिकार है. वह अधिकार उन्‍हें मिलना चाहिए. मैंने संदेश दे दिया है कि हमारी बेटी को भी प्‍यार करने का हक है और हमारी बहन को भी प्‍यार करने का अधिकार है., ’

बहरहाल तोगड़िया का इतना बड़ा ब्यान सच में सब को चौकाने वाला है क्योंकि अब तक तो विहिप और बजरंग दल भारत में वैलेंटाइन डे को प्रतिबंधित करने की वर्षों से मांग करते रहे हैं. दोनों संगठन इसे हिंदू-विरोधी के साथ भारत विरोधी भी मानते हैं, जो हर साल 14 फरवरी को मनाया जाता है. मतलब साफ़ है अगर कट्टर माने जाने वाले संगठनो की सोच में ऐसा बदलाव आया है तो ये उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है. आज अगर हमें दुनिया के साथ चलना है तो फिर इस बदलती दुनिया के साथ अपनी सोच को भी बदलना होगा. तोगड़िया ने इसी सूझ-बूझ का परिचय देते हुए अपने कार्यकर्ताओं को ये सन्देश दिया है क्योंकि वो ये जानते हैं कि वैलेंटाइन डे भारत के युवाओं और युवतियों में ख़ासा प्रसिद्ध है. उन्होंने जितना इसका विरोध किया ये त्यौहार यहाँ के युवा वर्ग में उतना ही पोपुलर हुआ. ऐसे में तोगड़िया का वैलेंटाइन डे का समर्थन करना और उसे अपने बहन-बेटी से जोड़ना की उन्हें भी प्यार करने का अधिकार है सच में स्वागत योग्य कदम है जिसकी जितनी सराहना की जाए उतनी कम है.

आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): अपने चार देशों के दौरे के तीसरे चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज यूएई में हैं. इस दौरे की सबसे ख़ास बात ये है कि  आज यहां पीएम मोदी ने अबू धाबी के पहले हिन्दू मंदिर बोचसानवसी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) की आधारशिला रखी और इस भव्य मंदिर के लिए 125 करोड़ भारतीयों की ओर से वली अहद शहजादा मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान को धन्यवाद दिया. उन्होंने अबू धाबी के मंदिर की नींव का पत्थर दुबई ओपेरा हाउस से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये रखा. मंदिर का शिलान्यास करने के बाद जब मोदी ने ओपेरा हाउस में भारतीयों को संबोधित करना शुरू किया, उनके स्वागत में जोर-जोर से ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए गए. पूरा ओपेरा हाउस इन नारों की गूंज से गूंज उठा. सारा माहौल मोदीमय हो गया और ऐसा लगा कि जैसे प्रवासी भारतियों के दिल में मोदी की एक ख़ास जगह है और वो जब भी उनके सामने जाते हैं तो लोगों के वो जज़्बात उनकी जुबान पर आ जाते हैं. 

दुबई ओपेरा हाउस में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए मोदी ने गल्फ देशों को धन्यवाद देते हुए कहा कि यहां उन्हें घर जैसा माहौल दिया गया. उन्होंने कहा, ‘मैं गल्फ देशों को धन्यवाद कहना चाहता हूं कि यहां भी मुझे 30 लाख भारतीयों का साथ मिला, जिसकी वजह से मैं यहां भी अपने घर की तरह ही महसूस कर रहा हूं.’ पीएम मोदी ने कहा, ‘हम उस परंपरा में पले बढ़े हैं जहां मंदिर मानवता का माध्यम है. ये मंदिर आधुनिक तो होगा ही लेकिन विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का अनुभव कराने का माध्यम बनेगा.’

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): जैसे-जैसे कर्नाटक विधानसभा चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं वैसे-वैसे बीजेपी और कांग्रेस अपने सियासी समीकरणों को साधने में जुटती जा रही हैं. कांग्रेस जहाँ अबतक बीजेपी के ख़ास वोट बैंक रहे लिंगायत समुदाय पर अपनी नजर गड़ाए हुए है तो वहीँ बीजेपी दलित समुदाय को साधने में तत्पर दिख रही है, जिसका झुकाव कांग्रेस की तरफ रहा है. गौरतलब है कि लिंगायतों का कर्नाटक की सियासत तय करने में हमेशा ही दबदबा रहा है तो वही दूसरी तरफ़ किसी भी पार्टी की जीत और हार में निर्णायक भूमिका दलित भी निभाते हैं जिनकी संख्या लगभग 24 फीसदी है. मतलब साफ़ है कि राहुल गांधी लिंगायतों पर नजर गडाए बैठे हैं तो बीजेपी के सीएम उम्मीदवार यदुरप्पा दलितों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयासरत हैं. जिसके तहत राहुल गाँधी मंदिर और मठों में घूम रहे हैं और कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बीएस येदुरप्पा ने शनिवार रात झुग्गी-झोपड़ियों में रात बिताने का फैसला किया.

बीएस येदुरप्पा ने बेंगलुरु के लक्ष्मणपुरी स्लम में मुनिराजू नाम के एक शख्स के घर शनिवार रात गुज़ारी. जहां दलित और पिछड़े वर्ग के लोग रहते हैं. बीजेपी के राज्य मीडिया संयोजक शांताराम ने बताया "देश भर में ऐसे प्रयास चल रहे हैं ताकि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अन्तोदय स्कीम को अमली जामा पहनाया जा सके और येदुरप्पा जी का स्लम में रात्रि विश्राम इसी की कड़ी है."

वहीं राहुल गाँधी की अगर बात करें तो वो बेंगलुरु से तक़रीबन 400 किलोमीटर दूर होसपेट में राहुल गांधी लिंगायतों को लुभाने की कोशिश में जुटे दिखे. उन्होएँ पहले तो लिंगायतों के प्रसिद्ध सिद्धेश्वर मठ की यात्रा की और फिर यहीं से निकलने वाले रास्ते से पहाड़ी पर बने शिव मंदिर में जाकर दर्शन किये. यानी कोशिश साफ़ है बीजीपी के मज़बूत लिंगायत वोट बैंक को तोड़ने की. साथ ही ये भी वादा किया जा रहा है कि उनकी सरकार लिंगायत को अलग राज्य का दर्जा देने को तैयार है. सरकार बनने के बाद वो इसे कैबिनेट से पास कर सिफारिश केंद्र सरकार को भेज देंगे.


गौरतलब है कि हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र में कुल 19 विधान सभा सीटें हैं. 2013 के विधानसभा चुनावों में इसमें से बीजेपी को 4, जेडीएस को 4, येदुरप्पा की केजीपी को 2, सीटें मिली थीं, जबकि शेष 9 सीटें कांग्रेस के खाते में गयी थीं. लेकिन इस बार समीकरण कुछ बदले-बदले नजर आ रहे हैं. क्योंकि 201३ में यदुरप्पा बीजेपी के साथ नहीं थे और उन्होंने बीजेपी से बगावत कर नई पार्टी बनाई थी. लेकिन इस बार वो न केवल बीजेपी के साथ आये हैं बल्कि वो बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भी हैं. साथ ही उन्हें राज्य में सबसे बड़े लिंगायत नेता के रूप में भी जाना जाता है. एक और बात जो यदुरप्पा के पक्ष में जाती है वो ये है की यदुरप्पा तक़रीबन 74 साल के  हो चुके हैं और ऐसा कहा जा रहा है कि ये येदयुरप्पा का  आखिरी चुनाव हो सकता है. तो लिंगायत समुदाय उन्हें इस बार मुख्यमंत्री के पद पर देखना चाह रहा है जिसने कांग्रेस की नींद उड़ा रखी है. इस इलाके के बाद उत्तर कर्नाटक बीजेपी के लिए अहम है. यहाँ भी बीजेपी बाज़ी मारती हुई नजर आ रही है क्योंकि यहां लिंगायतों के साथ-साथ ब्राह्मणों का भी बड़ा वोट बैंक है जो परंपरागत तौर पर बीजेपी को ही मिलते हैं.​

ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि दोनों पार्टियों ने इस बार इस क्षेत्र में जी-जान फूंक दी है. अब कौन सी पार्टी किसे कितना अपनी और खींच पायेगी ये तो तभी पता चलेगा जब चुनाव के नतीजे सामने आयेंगे लेकिन अभी दोनों पार्टियों के बीच खींचतान जारी है और जनता चुपचाप सब तमाशा देख रही है.

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अब अपने मिशन कर्नाटक पर जुट गये हैं. राज्य में जल्द चुनाव होने जा रहे हैं और मुख्य चुनौती अपने ढहते गढ़ को बचाना है जिसे बीजेपी का कांग्रेस मुक्त भारत फेल किया जा सके. इसी के मद्देनजर राहुल गाँधी कर्नाटक में प्रचार अभियान की शुरुआत करेंगे. गौरतलब है की राहुल अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत बेल्लारी से करेंगे. अपनी इस यात्रा के दौरान वो गुजरात की ही तरह मंदिरों में दर्शन करने भी जायेंगे. राजनितिक पंडितों की मानें तो राहुल गुजरात दौरे की ही भांति अपनी सॉफ्ट हिन्दू की छवि को बरकरार रखना चाहते हैं.इसलिए उनके इस दौरे में मंदिरों में जाकर दर्शन को प्रमुखता दी गयी है जिससे जनता में में एक सकारात्मक सन्देश दिया जा सके.

कर्नाटक दौरे की शुरुआत आखिर बेल्लारी से ही क्यों?

राहुल का अपने कर्नाटक दौरे की शुरुआत करने के पीछे भी एक ख़ास वजह है. दरअसल, साल 1999 में सोनिया गांधी ने अपना पहला चुनाव बेल्लारी लोकसभा सीट से ही लड़ा था. जहां उन्होंने इस सीट से बीजेपी के जाने-माने चेहरे सुषमा स्वराज को हराया था. उस चुनाव के दौरान भी राहुल गांधी कई दिनों तक प्रचार अभियान पर रहे थे. जिससे वहां के लोगों से उनकी अच्छी छवि है. साथ ही एक अलग कनेक्शन भी. इतना ही नहीं इसके बाद 2013 के विधानसभा चुनाव में सात साल बाद कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने में इसी बेल्लारी का बड़ा योगदान था. क्योंकि 2010 में विपक्ष के नेता रहे सिद्धारमैया ने खनन माफिया रेड्डी भाईयों के विरोध में बेंगलुरू से बेल्लारी तक पदयात्रा निकाली थी. माना जाता है कि इस पदयात्रा के बाद ही लोगों के बीच कांग्रेस ने अपनी जड़ मजबूत की थी.

लिंगायत समुदाय को साधना राहुल की सबसे बड़ी चुनौती......

राहुल गांधी अपनी 4 दिन की यात्रा में 10 से 13 फरवरी तक हैदराबाद-कर्नाटक इलाके का दौरा करेंगे. इस दौरान वो बेल्लारी, कोप्पल, गुलबर्गा और रायचुर जाएंगे. कांग्रेस अध्यक्ष शनिवार को हंपी के हॉस्पेट में एक जनसभा को भी संबोध‍ित करेंगे. इसके बाद राहुल हुलीगम्मा मंदिर दर्शन करने जाएंगे और वहां से गवी सिद्धेश्वर मठ भी जाने का कार्यक्रम है. गवी सिद्धेश्वर मठ को लिंगायत मठ भी कहा जाता है. दरअसल, जिस क्षेत्र में राहुल यात्रा कर रहे हैं वहां लिंगायत समुदाय की आबादी सबसे ज्यादा है. ऐसे में राहुल का गवी सिद्धेश्वर मठ जाना इसी समुदाय को कांग्रेस के पाले में लाने की कोश‍िश है. लिंगायत समुदाय को बीजेपी के कोर वोट के तौर पर भी देखा जाता है. सिद्धेश्वर मठ में दर्शन के बाद राहुल येलबर्गा विधानसभा में एक जनसभा को संबोध‍ित भी करेंगे.

गौरतलब है की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस दौरे के लिए इन जिलों में कांग्रेस ने पूरी तैयारी कर रखी है. कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल पहली बार बेल्लारी और अन्य जिलों में जा रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस कार्यकर्ता उनका जगह-जगह स्वागत भी करेंगे. इन सबके साथ राहुल गांधी अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थानों पर भी जा सकते हैं. जानकारी के मुताबिक राहुल मंदिर-मठ के साथ दरगाह भी जाएंगे.

 

 

आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): बीते कुछ सालों में उत्तर प्रदेश की पहचान केवल अपराध और लूटपाट के रूप में ही की जाती थी. अपनी प्राचीन विरासत और पारम्परिक धरोहर समेटे ये सूबा केवल अपराध के कारण सुर्ख़ियों में रहा, लेकिन अब यूपी के निज़ाम बदले हैं, सरकार बदली है और सिप्पेसालार बदले हैं तो इसका असर भी दिखना शुरू हो गया है. उत्तर प्रदेश में जैसे ही योगी आदित्यनाथ ने कमान संभाली तो उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपराधमुक्त बनाना अपनी पहली प्राथमिकता बताया. पुलिस को स्वतंत्रता दी गयी और अब अपराध पर लगाम लग्न शुरू हो गयी है. जगह-जगह इनामी बदमाशों के एनकाउंटर हो रहे हैं. इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश में अपराधियों के मन में एनकाउंटर का डर इस कदर बैठ गया है कि अब वे खुद पुलिस के आगे सरेंडर कर रहे हैं. ऐसा ही कुछ देखने को मिला हापुड़ के बाबूगढ़ थाने में, जहां सेंट्रो कार लूटने और एक शख्स को गोली मारने के 15 हजार रुपये के ईनामी आरोपी ने एनकाउंटर के डर से बाबूगढ़ थाने में सरेंडर कर दिया. ईटीवी भारत यूपी नाम के फेसबुक पेज पर आरोपी और पुलिस का एक वीडियो शेयर किया गया है, जिसमें आरोपी अपना गुनाह कबूलते हुए पुलिस के भय की बात बता रहा है. आरोपी बताता है कि उसका नाम अंकित कुमार है. आरोपी वीडियो में  कहता हुए दिख रहा है कि काफी समय से पुलिस उसके घर पर दबिश दे रही थी, एनकाउंटरों को देखते हुए रिश्तेदारों ने सरेंडर करने की सलाह दी. आरोपी कहता है कि पुलिस के भय से सरेंडर कर दिया. आरोपी यह भी बताता है कि 15 हजार रुपये का ईनाम उसके सिर रखा गया है.

 

वीडियो में आरोपी अपना गुनाह कबूलते हुए बताता है कि उसने सेंट्रो गाड़ी से लूट की थी और कार वाले को गोली मारी थी. पुलिस ने बताया कि 22 तारीख को बाबूगढ़ क्षेत्र में सेंट्रो गाड़ी से लूट हुई थी, जिसमें एक अभियुक्त को जेल भेजा गया था, दूसरे अभियुक्त के ऊपर 15 हजार रुपये का ईनाम रखा गया था. दूसरा अभियुक्त फरार चल रहा था. पुलिस उसकी खोज में थी. लेकिन उसने गुरुवार (8 फरवरी) को पुलिस के डर से अपने असलहे के साथ सरेंडर कर दिया. आगे की कार्रवाई की जा रही है.

पुलिस ने बताया कि आरोपी बता रहा है सीआईएसएफ में नौकरी करता है. यूपी में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से बदमाशों के एनकाउंटरों की तादात में खासा इजाफा हुआ है. आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 महीनों में पुलिस ने 942 एनकाउंटरों में 35 अपराधियों को मार गिराया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कई दफा अपने भाषणों में कह चुके हैं कि वह राज्य को अपराध मुक्त बनाएंगे. सीएम योगी कई समारोहों पर कह चुके हैं कि बदमाश या तो आपराध का रास्ता छोड़ दें या उत्तर प्रदेश छोड़कर चले जाएं.(इनपुट:जनसत्ता डॉट कॉम)