• मध्य प्रदेश: कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कर डाली चुनाव प्रभारी की पिटाई, राहुल गाँधी ने आपात बैठक बुलाई..........

    आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): मध्य प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी थमने का नाम ही नहीं ले रही. अब पार्टी एक-दो नहीं बल्कि कई खेमों में बंटी नजर आ रही है. साल के अंत में मध्य प्रदेश में चुनाव होने हैं ऐसे में ऐसी ख़बरें कांग्रेस की नींद उड़ाने वाली हैं. गुटबाजी का ये नज़ारा तब देखने को मिला जब रीवा में कांग्रेस महासचिव और चुनाव प्रभारी दीपक बाबरिया ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि अगर मध्य प्रदेश में अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो कमलनाथ या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया में से कोई एक मुख्यमंत्री होगा. बाबरिया के ऐसा कहने से दूसरे दिग्गज़ नेताओं के कार्यकर्ता भड़क गये और उन्होंने बाबरिया की पिटाई कर डाली. मौके की नज़ाकत को समझते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आपात बैठक बुलाई है. गौरतलब है कि बाबरिया रीवा के सर्किट हाउस में पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे. जहाँ उनसे जब कांग्रेस के सम्भावित मुख्यमंत्री के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो कमल नाथ या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया में से कोई एक मुख्यमंत्री बनेगा. इसके बाद एक और पत्रकार ने बाबरिया से पूछा कि क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस के दिग्गज नेता और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह मुख्यमंत्री की रेस से बाहर हो गये हैं तो इसपर बाबरिया ने कहा कि वो जो आप समझो. ऐसा जवाब सुनते ही वहां मौजूद अजय सिंह के समर्थक भड़क गये. उन्होंने बाबरिया के साथ धक्का-मुक्की की. बाबरिया बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर सर्किट हाउस के अपने कमरे में चले गये. हालांकि अजय सिंह ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि न तो वो अराजक हैं और ना ही उनके समर्थक ऐसी घटिया हरक़त कर सकते हैं. उन्होंने घटना पर दुःख जताते हुए कहा कि "जो भी हुआ, गलत हुआ है. ऐसे लोगों पर सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. वहीँ बाबरिया के साथ हुई इस धक्का-मुक्की की ख़बरें मीडिया में आने के बाद मध्य प्रदेश के गृहमंत्री भूपिंदर सिंह ने घटना का संज्ञान लेते हुए बाबरिया को पात्र लिखते हुए उनसे अनुरोध किया है कि यदि बाबरिया चाहें तो अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से अनुरोध कर सकते हैं. सरकार उन्हें पूरी सुरक्षा देगी. गृहमंत्री ने बारिया को लिखे अपने पत्र में कहा है कि मुझे मीडिया रिपोर्ट्स से ज्ञात हुआ है कि रीवा में आपसे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने धक्का मुक्की की. इससे पहले भी आपके साथ इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. मैं आपके साथ होने वाली इन घटनाओं से बहुत चिंतित हूँ. गृहमंत्री ने अपने पत्र में कहा कि यदि कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से बचाने के लिए आपको सुरक्षा की जरुरत हो तो आप मुझे बताएं, ताकि सुरक्षा के प्रबंध किये जा सकें. गृहमंत्री ने आगे कहा कि मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि मध्य प्रदेश सरकार आपको पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करेगी.  वहीं कांग्रेस ने इस घटना को बीजेपी प्रायोजित बताया. कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा ने कहा कि ये सब बीजेपी प्रायोजित घटना थी. उन्होंने गृहमंत्री के सुरक्षा मुहैया कराने वाले ब्यान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि गृह मंत्री की जिम्मेवारी सबसे पहले प्रदेश की बेटियों को सुरक्षा देने की है जिनके साथ रोज़ बलात्कार हो रहे हैं. बेटियों को तो सुरक्षा दे नहीं पा रहे हैं और बाबरिया को देने की बात कह रहे हैं.......     Read More
  • कारगिल विजय दिवस: जब भारत के वीर जवानों ने दिया था पाकिस्तान के दुस्साहस का करारा जवाब, भाग निकले थे घुसपैठिये........

    आवाज़(रेखा राव, दिल्ली): आज कारगिल विजय दिवस है वो दिन जब हमारे देश के वीर जवानों ने पाकिस्तानी सेना के दुस्साहस का करार जवाब देते हुए न केवल उसे युद्ध के मैदान में धूल चटाई थी बल्कि दुश्मन पीठ दिखाकर भाग खडा हुआ था. भारतीय सेना के व्स्स्र जांबाजों ने इसी दिन फिर से कारगिल को फट करते हुए वहां तिरंगा लहराया था. इस मौके पर देश के प्रधानमंत्री ने भी भारतीय सेना के वीर सैनिकों के शौर्य की सराहना की है साथ ही कारगिल में बलिदान देने वाले भारतीय वीर जवानों को भी श्रद्धांजली दी है. आवाज़ न्यूज़ नेटवर्क परिवार की तरफ से भी हमारे वीर जवानों को हृदय से नमन जिनके कारण हम अमनों-चैन से जीते हैं. गौरतलब कारगिल का युद्ध दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहला युद्ध था, जिसमें हर मिनट दुश्मनों पर फायरिंग की गई. हालांकि कारगिल की लड़ाई अपने आप में कई राज छुपाए हुए है. उस समय क्या हुआ था ये कोई नहीं जानता. हर कोई अलग-अलग अंदाजा लगाता है. इसीलिए हम आज आपको बताने जा रहे हैं कारगिल से जुड़े कुछ अहम राज जिन्हें जानकर आप हैरान हो जाएंगे. कारगिल की लड़ाई में हमारे सैनिकों ने पाकिस्तानी फौज का जमकर मुकाबला किया था. पाकिस्तानी घुस्पैठियों ने लगातार गोलियां चलाई और हमारे सैनिकों ने उन्हें सामने से जवाब दिया. आइये आपको बताते हैं इस युद्ध से जुड़े कुछ तथ्य:....... दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में कारगिल युद्ध हुआ था. इसकी शुरुआत हुई थी 8 मई 1999 से जब पाकिस्तानी फौजियों और कश्मीरी आतंकियों को कारगिल की चोटी पर देखा गया था. माना जाता है कि पाकिस्तान इस ऑपरेशन की 1998 से तैयारी कर रहा था. एक बड़े खुलासे के तहत पाकिस्तान का दावा झूठा साबित हुआ कि करगिल लड़ाई में मुजाहिद्दीन शामिल थे. यह लड़ाई पाकिस्तान के नियमित सैनिकों ने लड़ी. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व अधिकारी शाहिद अजीज ने यह राज उजागर किया था. कारगिल सेक्टर में 1999 में भारतीय और पाकिस्तानी सैनिकों के बीच लड़ाई शुरू होने से कुछ सप्ताह पहले जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक हेलिकॉप्टर से नियंत्रण रेखा पार की थी और भारतीय भूभाग में करीब 11 किमी अंदर एक स्थान पर रात भी बिताई थी. मुशर्रफ के साथ 80 ब्रिगेड के तत्कालीन कमांडर ब्रिगेडियर मसूद असलम भी थे. दोनों ने जिकरिया मुस्तकार नामक स्थान पर रात बिताई थी. जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था. कई लोगों का कहना है कि कारगिल की लड़ाई उम्मीद से ज्यादा खतरनाक थी. हालात को देखते हुए मुशर्रफ ने परमाणु हथियार तक इस्तेमाल करने की तैयारी कर ली थी. पाकिस्तानी सेना कारगिल युद्ध को 1998 से अंजाम देने की फिराक में थी. इस काम के लिए पाक सेना ने अपने 5000 जवानों को कारगिल पर चढ़ाई करने के लिए भेजा था. कारगिल की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को पहले इस ऑपरेशन की खबर नहीं दी गई थी. जब इस बारे में पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को बताया गया तो उनहोंने इस मिशन में आर्मी का साथ देने से मना कर दिया था. पाकिस्तानी सेना कारगिल युद्ध को 1998 से अंजाम देने की फिराक में थी. इस काम के लिए पाक सेना ने अपने 5000 जवानों को कारगिल पर चढ़ाई करने के लिए भेजा था. कारगिल की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को पहले इस ऑपरेशन की खबर नहीं दी गई थी. जब इस बारे में पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को बताया गया तो उनहोंने इस मिशन में आर्मी का साथ देने से मना कर दिया था. उर्दू डेली में छपे एक बयान में नवाज शरीफ ने इस बात को स्वीकारा था कि कारगिल का युद्ध पाकिस्तानी सेना के लिए एक आपदा साबित हुआ था. पाकिस्तान ने इस युद्ध में 2700 से ज्यादा सैनिक खो दिए थे. पाकिस्तान को 1965 और 1971 की लड़ाई से भी ज्यादा नुकसान हुआ था. भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ कारगिल युद्ध में मिग-27 और मिग-29 का प्रयोग किया था. मिग-27 की मदद से इस युद्ध में उन स्थानों पर बम गिराए जहां पाक सैनिकों ने कब्जा जमा लिया था. इसके अलावा मिग-29 करगिल में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ इस विमान से पाक के कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलें दागी गईं थीं. मई को कारगिल युद्ध शुरू होने के बाद 11 मई से भारतीय वायुसेना की टुकड़ी ने इंडियन आर्मी की मदद करना शुरू कर दिया था. कारगिल की लड़ाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में वायुसेना के करीब 300 विमान उड़ान भरते थे. कारगिल की ऊंचाई समुद्र तल से 16000 से 18000 फीट ऊपर है. ऐसे में उड़ान भरने के लिए विमानों को करीब 20,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ना पड़ता है. ऐसी ऊंचाई पर हवा का घनत्व 30% से कम होता है. इन हालात में पायलट का दम विमान के अंदर ही घुट सकता है और विमान दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है. भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में लड़े गए कारगिल युद्ध में तोपखाने (आर्टिलरी) से 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे. 300 से अधिक तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों ने रोज करीब 5,000 बम फायर किए थे. लड़ाई के महत्वपूर्ण 17 दिनों में प्रतिदिन हर आर्टिलरी बैटरी से औसतन एक मिनट में एक राउंड फायर किया गया था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी, जिसमें किसी एक देश ने दुश्मन देश की सेना पर इतनी अधिक बमबारी की थी.(सौजन्य:आजतक डॉट इन) Read More
  • प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से पीछे हटे राहुल गांधी, कांग्रेस अब मायावती या ममता बैनर्जी पर खेल सकती है बड़ा दांव......!

    आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली):  देश भर में लोकसभा चुनावों का आगाज़ हो चूका है. तमाम पार्टियों ने इसके लिए कमर कस ली है. फिर चाहे वो सत्तारूढ़ बीजेपी हो या कांग्रेस सबने अपने हिसाब से राजनितिक समीकरण बैठने शुरू कर दिए हैं. लेकिन इन सब के बीच एक बाद खबर ये आ रही है कि कल तक जो कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बता रहे थे उन्होंने अब परिस्थियों को भापते हुए प्रधानमंत्री पद की अपनी उम्मीदवारी से हाथ पीछे खींच लिए हैं. राजनितिक पंडितों की मानें तो ऐसा कदम कांग्रेस ने बहुत घन विचार-विमर्श के बाद उठाया है. दरअसल पिछले काफी समय से कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ महागठबंधन के लिए प्रयासरत है लेकिन उसमे उसे अबतक कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली है. कांग्रेस ने इसके लिए कई क्षेत्रीय क्षत्रपों से भी सम्पर्क साधा लेकिन बार सिरे चढ़ते हुए नहीं दिख रही है. क्योंकि ज्यादातर क्षेत्रीय दलों को राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मंजूर नहीं हैं. इसलिए कांग्रेस अब मजबूरी में राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद की  उम्मीदवारी से कदम पीछे खींच रही है. सूत्रों की मानें तो कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेत्रित्व में सब दलों को एकजुट करने का अभियान तो चलाया लेकिन जेडीएस को छोड़कर कोई भी दूसरा दल राहुल गांधी के नेत्रित्व में चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ. ऐसे में कांग्रेस ने अब राहुल की उम्मीद्वारी को पीछे छोड़ देश भर में मोदी के खिलाफ महागठबंधन बनाने की कवायद शुरू की है. जनसत्ता की मानें तो राहुल गांधी अब सब क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लेकर चलना चाह रहे हैं और इसके लिए कई प्रदेशों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को ज्यादा सीटें देकर खुद कम सीटों पर भी लड़ सकती है. मुख्य मिशन मोदी को सत्ता में आने से रोकना है और इसके लिउए उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र राहुल की रणनीति में सबसे आगे हैं. उत्तर प्रदेश में जहां कांग्रेस सपा-बसपा आर एल डी के साथ गठबंधन में उतरने के लिए प्रयासरत है वहीँ बिहार में आर जे डी और पश्चिम बंगाल में ममता की टी एम् सी के साथ गठबंधन की कवायद में जुटी हैं. ऐसा ही कुछ महाराष्ट्र में शरद पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन के रूप में देखने को मिलेगा. दरअसल राहुल को लगता है कि अगर मोदी को सत्ता में काबिज़ होने से रोकना है तो ये राज्य सबसे महत्वपूर्ण साबित होंगे. ऐसे में कांग्रेस उतर प्रदेश में जहां बसपा और सपा को ज्यादा सीटें देकर खुद नाममात्र की सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी वहीँ पश्चिम बंगाल में ममता और बिहार में आर जे डी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेंगी जबकि कांग्रेस के हिस्से कम ही सीटें आएँगी. हालांकि महाराष्ट्र की परिस्थितियां थोड़ी अलग हैं. यहाँ कांग्रेस की एनसीपी के साथ बराबर की सीटों पर लड़ने की बात बन सकती है. या फिर यहाँ कांग्रेस लोकसभा में ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और विधानसभा चुनाव में एनसीपी को ज्यादा सीटों पर लड़ने के लिए राज़ी कर सकती है. शरद पवार को भी इसमें कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि उनका सारा ध्यान महाराष्ट्र की राजनीती पर ही है. अब सबसे जरुरी बात जो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर है कि आखिर किसके नेत्रित्व के नीचे कांग्रेस और बाकी दूसरे दल मोदी के खिलाफ उतरेंगे. सूत्रों की मानें तो इसके लिए कांग्रेस ने एक फार्मूला तैयार किया है. जिसमे हर एक राज्य में चेहरा अलग होगा. जहां कांग्रेस की स्थिति मज़बूत है वहां राहुल गांधी ही मुख्य चेहरा होंगे वहीँ उत्तर प्रदेश में मायावती, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में तेजस्वी यादव मोदी के खिलाफ लड़ाई में मुख्य चेहरा होंगे. वहीँ अगर चुनावों में एनडीए 230 -240 सीटों में सिमट जाता है तो फिर कांग्रेस पहले राहुल गांधी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करेगी. अगर बात नहीं बनती है तो फिर कांग्रेस मायावती या फिर ममता बनर्जी के ऊपर भी अपना दांव खेल सकती है. यानी मतलब साफ़ है मोदी को रोको और उसके लिए फिर चाहे किसी भी हद तक जाना पड़े.   Read More
  • अमित शाह ने शुरू किया जमा-घटा का खेल, शिव-सेना छिटकी तो एआइएडीएमके को साथ लेकर लेकर पूरा करेंगे मिशन 2019..........

    आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): महाराष्ट्र में बीजेपी और शिव-सेना दोनों पार्टियों में मतभेद दिनोंदिन गहराते जा रहे हैं. दोनों ही पार्टियाँ अगले लोकसभा चुनाव में अलग-अलग लड़ने का मन बना चुकी हैं. शिव-सेना ने तो खुले मंच से इसका ऐलान भी कर दिया है लेकिन बीजेपी अभी ऐसा करने से बाख रही है लेकिन सूत्रों की मानें तो बीजेपी ने भी इसके लिए तयारी शुरू कर दी है और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को इसके लिए तैयारी शुरू करने के लिए भी कह दिया है. मतलब साफ़ है कि तीन दशकों तक साथ चलने के बाद अब बीजेपी-शिव्सेनाल्ग होने की राह पर खड़े हैं. हालांकि बीजेपी सांसद सुब्रमणियास्वामी की मानें तो शिव-सेना लोकसभा चुनावों के आते-आते बीजेपी के साथ आ जाएगी लेकिन राजनितिक पंडितों की मानें तो अभी इसके आसार कम ही नजर आ रहे हैं. ऐसे में अगर शिव-सेना बीजेपी के रास्ते महाराष्ट्र में अलग होते हैं तो कांग्रेस और एनसीपी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहेगा क्योंकि उन्हें पता है कि बीजेपी-शिवसेना अगर मिलकर लादे तो फिर उन्हें हराना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन हो जाएगा. अब सवाल ये पड़ा होता है कि अगर बीजेपी-शिव-सेना अलग हुए तो फिर होने वाले इस नुक्सान की भरपाई कैसे होगी? तो इस सवाल का समाधान बीजेपी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने खोज लिया है. सूत्रों की मानें तो शिव-सेना के एनडीए से जाने की स्थिति में बीजेपी तमिलनाडु की एआईए डीएमके को अपने साथ एनडीए में लाकर जहां नुक्सान की भरपाई करेगी वहीँ दक्षिण में भी पार्टी के इस कदम से बीजेपी का जनाधार बढाने में मदद मिलेगी. सूत्रों की मानें तो अमित शाह ने एआईएडीएमके से नजदीकियां बढाने की कवायद भी शुरू कर दी है. इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला जब संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान एआईएडीएमके  बीजेपी के साथ खड़ी हुई दिखाई दी. और इससे पहले भी बीजेपी ने एआईएडीएमके के दो धड़ों को एक करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके लिए स्वयं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने उनका शुक्रिया अदा किया था. राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस नए पार्टनर की पठकथा काफी पहले से लिखी जा रही है और समय आने पर इस बात का ऐलान भी हो जाएगा. वैसे भी डीएमके के कांग्रेस के साथ जाने के बाद एआईएडीएमके के पास दूसरा कोई चारा बचा भी नहीं है. जानकारों की मानें तो बीजेपी के इस कदम से जहाँ पार्टी का जनाधार दक्षिण में भी बढ़ेगा, वहीँ पार्टी शिव-सेना के अलग जाने से होने वाले मुक्सान की भरपाई करने के साथ मुनाफे में भी जायेगी. क्योंकि लोकसभा में इस समय जहाँ शिव-सेना के 18 सांसद हैं वहीं एआईएडीएमके के 37, वहीं राज्यसभा में शिव-सेना के मात्र 3 सांसद हैं वहीं एआईएडीएमके के 13. यानी मतलब साफ़ है कि एनडीए की स्थिति और मजबूत होगी. हालांकि इसके लिए अभी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह थोडा इंतज़ार कर रहे हैं. सूरतों की मानें तो शाह साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव तक का इंतज़ार कर रहे हैं. अगर नतीज़े बीजेपी की आशा के अनुरूप आते हैं तो बीजेपी निश्चित तौर पर शिव-सेना की विदाई ही करना चाहेगी क्योंकि बीजेपी का मानना है कि एक टफ तो शिव-सेना सत्ता की मलाई खा रही है और दूसरी तरफ बीजेपी को बात-बात पर आँख दिखाती है. ऐसे में उसका एनडीए से अलग होना ही बेहतर है. सुरों की मानें तो महाराष्ट्र में ही शिव-सेना के अलग होने की स्थिति में राज ठाकरे को भी अपने साथ लिया सकता है और इसमें केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी अहम भूमिका निभा सकते हैं. अब आगे होगा क्या इसका पता तो साल के अंत में होने वाले कुछ राज्यों के चुनावों के नतीजों के बाद चल ही जाएगा, लेकिन इतना तय है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपना जमा-घटा का खेल शुरू कर दिया है और किसी भी कीमत पट अपने मिशन 2019 को पूरा करने में जुटे हुए हैं.     Read More
  • लोग वीफ खाना छोड़ दें तो अपने आप रुक जाएगा भीड़ का कत्ले-आम : इंद्रेश कुमार

    आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): देश भर में मोब-लिंचिंग की घटनाएं रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं. राजस्थान के अलवर से शुरू हुआ ये विवाद अब पूरे देश में अपने पांव पसार रहा है. इसी बीच राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के एक बड़े नेता इन्द्रेश कुमार ने मोब लिंचिंग को लेकर एक बड़ा ब्यान दिया है जिसपर राजनीति होना तय है. इन्द्रेश ने अपने एक ज्ञान में कहा है कि अगर लोग वीफ खाना छोड़ दें तो इस तरह की घटनाएं अपने आप रुक जायेंगी. साथ ही संघ नेता ने ऐसी समस्या से निपटने के लिए संस्कार और सामाजिक मूल्यों की भूमिका को भी प्रमुख बताया है.  इन्द्रेश कुमार ने कहा की मोब लिंचिंग जैसी घटनाओं को किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता. लेकिन अगर लोग गौ-मांस खाना छोड़ दें तो इस तरह की घटनाएं अपने आप रुक जायेंगी. इन्द्रेश ने कहा कि किसी भी धर्म में गौ-मांस को खाने की इजाज़त नहीं है. इन्द्रेश की मानें तो ईसाई धर्म में भी गौ-मांस खाने की मनाही है क्योंकि जीसस का जन्म गौ-शाला में हुआ था जिसके कारण ईसाई लोग भी गाय को पवित्र मानते हैं. साथ ही मुस्लिमों के पवित्र स्थल मक्का-मदीना में भी गाय की हत्या पर रोक है. यानी संसार में कहीं भी किसी भी धर्म में गाय को मारने की अनुमति नहीं दी गई है. गाय को समस्त धर्म पवित्र मानते हैं. ऐसे में लोगों को चाहिए कि वो जनभावनाओं को समझें और गाय की हत्या न करें. वहीँ इन्द्रेश कुमार ने ऐसे मामलों में कानून और सरकार की भूमिका को भी स्पष्ट किया. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में क़ानून को अपना काम करना चाहिए और सरकार को भी बिना किसी दवाब में आए अपनी जिम्मेवारी निभानी चाहिए. साथ ही समाज को भी ऐसे मूल्यों को अपनाना चाहिए जिससे इस तरह की घटनाएं ही न हों. गौरतलब है कि इंद्रेश कुमार झारखण्ड के रांची में हिन्दू जागरण मंच की इकाई के कार्यालय के उदघाटन के अवसर पर पहुंचे थे जहाँ उन्होंने ये बात कही. Read More
  • उत्तर प्रदेश: सपा-बसपा को मात देने के लिए मोदी-शाह- योगी ने बनाई रणनीति, बड़ा सवाल : क्या मोदी फिर जीत पाएंगे उत्तर प्रदेश का किला..................!

    आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): कहते हैं जिसने देश पर राज करना हो तो उसे उत्तर प्रदेश पर पहले कब्ज़ा ज़माना पड़ता है, या यों कहें कि केंद्र की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर ही गुजरता है. लेकिन अभी हाल ही में जिस तरह से उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने जिस तरह से गोरखपुर और फूलपुर और फिर कैराना और नूरपुर हारा उसने बीजेपी के मिशन 2019 के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है. बीजेपी बच्क्फूत पर है और उसके विरोधी ये मानकर चल रहे हैं की आगामी लोकसभा चुनावों में भी सपा-बसपा का ये गठबंधन मोदी के विजय रथ को रोकने में कामयाब रहेगा. ऐसे में अगर कांग्रेस भी सपा-बसपा के साथ जुड़ गई तो बीजेपी के राहें और मुश्किल हो जायेंगी. इन्हीं सब चुनौतियों के मद्देनजर अब उत्तर प्रदेश की कमान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्भाली है और वो अब एक ऐसी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं जिससे बीजेपी एक बार फिरसे 2019 में उत्तर प्रदेश के किले को फट करते हुए केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हो. सूत्रों की मानें तो मोदी-अमित शाह-और योगी ने मिलकर ऐसी रणनीति तैयार की है जिससे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के मंसूबों पर पानी फेरा जा सके. मोदी-शाह-योगी जिन पहलुओं पर काम कर रहे हैं आइये उनपर डालते हैं एक नजर:-  मोदी की रैलियों से बनाया जा रहा है बीजेपी के पक्ष में माहौल..... सूत्रों की मानें तो बीजेपी उत्तर प्रदेश में मोदीमय माहौल बनाने में एक बार फिर से जुट गई है. जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं मोर्चा संभाल लिया है. चुनाव से एक साल पहले से ही मोदी एक के बाद एक ताबड़तोड़ रैलियां करने में जुटे हैं. इसी कड़ी में पिछले एक महीने के अंदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सूबे में पांच रैलियों को सम्बोधित कर चुके हैं और आगे भी ये सिलसिला जारी रहने की उम्मीद जताई जा रही है. सूत्रों की मानें तो लोकसभा चुनवा से पहले उत्तर प्रदेश में प्रधानमन्त्री मोदी की लगभग 20 रैलियां कराने की योजना बनाई गई है. रैलियों की रूपरेखा कुछ इस तरह से तैयार की गई है जिसमे प्रत्येक रैली के जरिए 2 से 3 संसदीय क्षेत्रों वोटरों को कवर किया जा सके.जिससे फिर से एक बार चुनाव से पहले सूबे का माहौल मोदीमय हो जाए और चुनावों में इसका फायदा बीजेपी को मिल सके. जल्द हो सकता है योगी मंत्रिमंडल में फेरबदल...... सूत्रों की मानें तो 2019 के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में जल्द मंत्रिमंडल में फेरबदल के साथ-साथ विस्तार भी हो सकता है. जिसमें उन चेहरों को तरजीह दी जा सकती जिन्होंने विभिन्न मुद्दों पर कई बार योगी के खिलाफ आवाज़ उठाई है. साथ ही मंत्रिमंडल कुछ दलित चेहरों को भी तरजीह दी जा सकती है जिससे सपा-बसपा के गठबंधन को हराया जा सके. दरअसल उत्तर प्रदेश में बीजेपी मायावती के सामने कुछ ऐसे दलित चेहरों को उतरना चाहती है जो मायावती के कद के हों. साथ ही दलित समुदाय से कुछ ऐसे युवाओं को भी आगे लाना चाह रही है जिनकी छवि दलितों के बीच अच्छी हो. ऐसे में उम्मीद ये जताई जा रही है कि ऐसे किसी दलित चेहरे को भी मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है जो बेशक पहली बार चुनाव जीता हो लेकिन उसकी पकड़ जनता के बीच अच्छी हो. कई ताक़तवर मंत्रियों को भी लड़वाया जा सकता है चुनाव..... सपा-बसपा गठबंधन की चुनौती और मौजूदा सांसदों के खिलाफ विरोधी फैक्टर का मुकाबला करने के लिए बीजेपी यूपी सरकार के अपने कई ताकतवर मंत्रियों को चुनाव लड़ा सकती है. इसके लिए बीजेपी राज्य के अपने सबसे प्रभावशाली मंत्रियों की सूची भी तैयार कर रही है, जिनकी चुनाव क्षेत्र में अच्छी पकड़ है. वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सतीश महाना, एसपी शाही, दारा सिंह चौहान, एसपीएस बघेल और स्पीकर हृदय नारायण दीक्षित जैसे चेहरों को 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी उतार सकती है. नए चेहरों पर भी लगाया जायेगा दांव......  बीजेपी हाई कमान ने चुनावों से काफी वक़्त पहले ही ये साफ संकेत दिए हैं कि वह 71 विजयी उम्मीदवारों में से 50 फीसदी को इस बार मौका नहीं देंगे जिसका मतलब ये हुआ कि इन सीटों पर नए उम्मीदवार नजर आयेंगे. ऐसे में पार्टी को जिताऊ उम्मीदवारों की जरूरत है जिससे राज्य में सीटों का गणित न गड़बड़ाए. सूत्रों की मानें तो इन सभी सीटों पर बीजेपी ऐसे कुछ नए चेहरों को मैदान में उतारेगी जो मोदी के लिए भविष्य की राजनीती करें और जनता के बीच उनकी छवि भी अच्छी हो. बीजेपी ये प्रयोग दिल्ली के मुन्सिपिअल इलेक्शन में भी कर चुकी है जहाँ उसे इसमें कामयाबी मिली थी. बीजेपी का इस बात पर भी फोकस है कि उम्मीदवार मजबूत हों और उनकी जीत पक्की हो. हालांकि अभी गोरखपुर सीट को लेकर बीजेपी बड़ी दुविधा में है. योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने बाद हुए उपचुनाव में बीजेपी को हार मिली है. ऐसे में मजबूत उम्मीदवारों को लेकर मंथन किया जा रहा है. OBC समुदाय के गैर यादव वोट बैंक पर रहेगी ख़ास नजर...... सपा-बसपा के साथ आने से बीजेपी का समीकरण बिगड़ा है ये बात बीजेपी को भली-भाँती तरह पता है. पार्टी को ये मालूम है कि यादव समुदाय का वोट बैंक उसे हासिल नहीं हो पायेगा. जो यादव बीजेपी के साथ जुदा है वो हर हाल में उसके साथ ही रहेगा लेकिन सपा से यादव वोट बैंक को छीनना अभी मुमकिन नहीं है. ऐसे में बीजेपी अपनी जमीन को मजबूत करने के लिए गैर यादव ओबीसी मतों को साधने की कवायद में जुट गई है. गैर यादव वोट बैंक पर नजर डालें तो यहाँ बीजेपी खासकर कुर्मी समुदाय को अपने पक्ष में साधने के लिए जुट गई है. बीजेपी ने इसको लेकर बीजेपी ने खास प्लान बनाया है. उसी प्लान के चलते मोदी की यूपी में अभी तक जो रैलियां हुई हैं उनमें मिर्जापुर और शाहजहांपुर दोनों कुर्मी बहुल क्षेत्र है. सूत्रों की माने तो बीजेपी जल्द क=ही इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रदेश में पार्टी की कमान कुर्मी समाज के नेता को सौंप सकती है. इसके अलावा प्रजापति, मौर्य, लोध, पाल सहित गैर यादव ओबीसी पर बीजेपी का ख़ास धयान है और पार्टी उ=इन समुदायों को अपने साथ जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. पार्टी यादव समुदाय को उत्तर प्रदेश में कुछ इस तरह पेश कर रही है जैसे अखिलेश के राज़ में केवल यादवों का ही भला हुआ और बाकी ओ बी सी समुदाय की अखिलेश ने अनदेखी की. ध्रुवीकरण की बिसात फिर दिखायेगी अपनी करामात ...... सपा-बसपा जातीय समीकरण के जरिए मोदी को मात देने की कोशिश में हैं. वहीं, बीजेपी 2014 की तर्ज पर हिंदुत्व की बिसात बिछाने में जुटी है. यूपी में बीजेपी उन सीटों पर खास नजर लगाए हुए हैं, जहां विपक्ष मुस्लिम उम्मीदवार उतारेगा. खासकर पश्चिम यूपी की सीटों पर नजर है, जहां आसानी से ध्रुवीकरण के जरिए चुनावी जंग फतह की जा सके.यानी मतलब साफ़ है कि जिस तरह बीजेपी ने पिछली बार किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकेट नहीं दिया था ठीक उसी तरह इस बार भी बीजेपी किसी भी मुस्लिम को टिकेट नहीं देगी. 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  • समय पूर्व दिसम्बर में ही हो सकते लोकसभा चुनाव, प्रधानमन्त्री मोदी के साथ अमित शाह के इलेक्शन मोड में आने से मिला अफवाहों को बल..........!

    आवाज़(मुकेश शर्मा, दिल्ली): प्रधानमंत्री आज उत्तर प्रदेश में गरज़े, निशाने पर सीधे कांग्रेस थी और काग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी. वहीँ अमित शाह ने मध्य प्रदेश में जमकर कांग्रेस को घेरा. यानी मतलब साफ़ है की बीजेपी इलेक्शन मोड़ में आ चुकी है. हालांकि बीजेपी इसे साल के अंत में होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारी बता रही है लेकिन जानकारों की मानें तो इन्हीं राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ बीजेपी लोकसभा चुनाव भी करवा सकती है. इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह बीजेपी के प्रति दिनोंदिन बढ़ता असंतोष बताया जा रहा है. साथ ही विपक्ष के बीच जिस तरह से एकता की कवायद शुरू हो चुकी है ऐसे में अगर बीजेपी के खिलाफ एक महागठबंधन बन गया तो बीजेपी के लिए मुसीबत पैदा हो सकती है.  जानकारों की मानें तो जिस तरह से उत्तर प्रदेश में बसपा-सपा के गठबंधन ने बीजेपी को हर मोर्चे पर शिकस्त दी उसने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की नींद उड़ा रखी है. बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद सपा-बसपा ने बीजेपी के हाथों से फूलपुर और गोरखपुर छीने तो बाद में नूरपुर और कैराना में बीजेपी को करारी मात देकर ये साबित किया की मोदी को हराना नामुमकिन नहीं है इसके लिए बस विपक्ष को अपने मतभेद भुलाकर एक साथ आना होगा. शायद इसी का नतीजा है कि अब देशभर में बीजेपी के खिलाफ सारा विपक्ष एक साथ मोदी के खिलाफ चुनाव में आने की मुहीम पर मेहनत कर रहा है जिसके नतीजे भी सामने आरहे हैं. कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर बीजेपी के सरकार बनाने के मंसूबों पर पानी फेर दिया. अब यही विपक्षी एकता की क़वायद महाराष्ट्र में भी शुरू हो चुकी है जहाँ बीजेपी का पुराना साथी शिवसेना उनके साथ नहीं है. यहाँ एनसीपी-कांग्रेस एक मज़बूत गठबंधन की कवायद में जुटे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है की अगर बीजेपी और शिवसेना अलग-अलग लादे तो कांग्रेस-एनसीपी उन्हें मात दे सकते हैं. वहीँ बंगाल में भी कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ ममता के साथ गठबंधन के लिए उत्सुक है. अगर ममता से बात नहीं बनती है वाम मोर्चा इ और विकल्प हो सकता है. इसके अलवा बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, सब राज्यों में बीजेपी के खिलाफ़ विपक्ष एकजुट हो रहा है जो जाहिर तौर पर बीजेपी के लिए चिंता का सबब है. ऐसे में जानकारों की मानें तो बीजेपी इस तरह से विपक्ष को एकजुट होने का समय नहीं देना चाहती. इससे पहले कि विपक्ष एकजुट हो बीजेपी साल के अंत में होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ लोकसभा चुनाव भी करवा सकती है.  हालांकि बीजेपी इसे महज़ अफवाह ही बता रही है. बीजेपी के मुताबिक लोकसभा चुनाव अपने तय वक़्त पर ही होंगे. पार्टी की मानें तो अभी पार्टी का सारा ध्यान आने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों पर केन्द्रित है जिसके लिए बीजेपी तरह-तरह से लोगों तक अपनी पहुँच बनाने की कोशिशों में जुटी हुई है. अब होता क्या है ये तो वक़्त ही बतायेगा लेकिन इतना तय है कि बीजेपी के चाणक्य अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ समय से जिस तरह से इलेक्शन मोड़ में आये हैं उससे इस तरह की अफवाहों को और बल मिला है. Read More
  • हरियाणा: मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है बाढ़डा, सरकार और स्थानीय एम्एलए अपने एसी कमरों में मस्त, जनता त्रस्त: देवेन्द्र आर्यनगर

    आवाज़(मुकेश शर्मा, गुरुग्राम): बाढ़डा हल्का आज अपने बुरे दिनों के लिए रो रहा है. सरकार और  स्थानीय एमएलए अपने एसी कमरों में मस्त हैं और जनता त्रस्त है. समझ नहीं आ रहा कि किसके पास जाएँ, किसे अपने दुखड़े सुनाएं. कुछ ऐसा कहना है कांग्रेस नेता देवेन्द्र आर्यनगर का. आर्यनगर ने बीजेपी की सरकार पर बाढ़डा की अनदेखी करने का आरोप लगाया. देवेन्द्र की मानें तो बीजेपी राज के पिछले 4   साल में बाढ़डा आगे जाने के बजाए पीछे चला गया है. देवेन्द्र ने आरोप लगाया की आज बाढ़डा में कैंसर रोग बुरी तरह से पांव पसार रहा है, लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही. आलम ये है कि बाढ़डा के लगभग 119 गांवों में कैंसर एक भयानक बीमारी के रूप में उभर रहा है. लेकिन सरकार तमाश्गीन बनी हुई है. जब भी चुनाव आते हैं तो जनता बड़ी उम्मीद से वोट देती है कि जनप्रतिनिधि उनकी बिजली, पानी और सडक जैसी मूलभूत समस्याओं को सुलझाएगा लेकिन अंत में उनके हाथ निराशा ही लगती है. आर्यनगर ने कैंसर की मुख्य वजह यहाँ के पानी को बताया.उन्होंने कहा कि बाढ़डा हलके में वैसे ही पानी की समस्या पिछले कई वर्षों से चली आ रही है जिसके कारण बाढ़डा डार्क जोन में आता है. ज्यादातर गांवों में भूमि जल स्तर पूरी तरह गिर चुका है और जहाँ पानी है भी उसमे क्लोराइड की मात्रा इतनी ज्यादा है की लोग उस पानी को पीकर कैंसर जैसी बिमारी का शिकार हो रहे हैं. सरकार तमाशगीन बनी हुई है और लोग परेशान हैं. देवेन्द्र ने कहा कि अबकी बार चुनावों में जनता उन सब नेताओं को सबक सिखाएगी जो यहां के नेता याद रखेंगे. वहीँ देवेन्द्र ने आज तक इस समस्या का समाधान न होने की सबसे बड़ी वजह बताई कि जो भी नेता यहाँ से जीता वो बाढ़डा से बाहर जाकर बस गया. फिर उसे यहाँ के लोगों के सुख-दुःख से कोई वास्ता नहीं रहा. वहीँ कांग्रेस ने भी जिसको टिकेट दिया वो उम्मीदवार बाढ़डा का न होकर बाहरी था. देवेन्द्र ने कहा कि अब वक़्त आ गया है जब बाढ़डा की जनता ने मन बना लिया है कि जो नेता बाढ़डा के लोगों को इन समस्याओं से निजात दिलाएगा वो उसी का साथ देगी. वहीँ आर्यनगर ने उम्मीद जताई कि कांग्रेस भी यहाँ के लोगों की मनोभावनाओं को समझते हुए यहाँ के ही किसी वाशिंदे को टिकेट देगी और जनता उसे भारी मतों से जिताकर भेजेगी. आर्यनगर ने उम्मीद जताई कि जनता अगले चुनाव में बीजेपी को खारिज़ कर कांग्रेस के साथ चलेगी और कांग्रेस राज में ही बाढ़डा के लोगों को इन समस्याओं से निजात मिलेगी.   Read More
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